New Delhi News: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान पारसी महिलाओं के अधिकारों को लेकर बड़ी टिप्पणी की है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि अंतरधार्मिक विवाह करने वाली पारसी महिलाओं का धार्मिक बहिष्कार प्रथमदृष्टया भेदभावपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत ‘अंतःकरण का अधिकार’ हर व्यक्ति का जन्मजात अधिकार है, जिसे केवल विवाह के आधार पर किसी भी स्थिति में छीना नहीं जा सकता।
सबरीमाला और अन्य धार्मिक स्थलों पर भेदभाव से जुड़े मामलों की सुनवाई
यह संविधान पीठ वर्तमान में केरल के सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के व्यापक मुद्दों की समीक्षा कर रही है। अदालत इस संवैधानिक प्रश्न पर विचार कर रही है कि क्या किसी धार्मिक समुदाय के प्रमुख को अपने सदस्यों को बहिष्कृत करने का अधिकार है। पीठ ने जांच की कि क्या यह अधिकार अनुच्छेद 25 के तहत किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता और अपनी आस्था का पालन करने के मौलिक अधिकार के साथ सह-अस्तित्व में रह सकता है।
विवाह नहीं हो सकता भेदभाव का आधार, वकील ने दी दलीलें
सुनवाई के दौरान एक पारसी महिला याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डेरियस खंबाटा ने तर्क दिया कि अंतरधार्मिक विवाह के कारण बहिष्कार की सजा देना कानूनी रूप से गलत है। याचिकाकर्ता महिला ने एक हिंदू पुरुष से विवाह किया था, जिसके बाद उसे समुदाय से बहिष्कृत कर दिया गया। अधिवक्ता खंबाटा ने कहा कि महिला ने अपनी आस्था या धर्म नहीं छोड़ा है। उन्होंने इस प्रतिबंध को एक प्रगतिशील धर्म पर थोपी गई अनावश्यक पाबंदी करार देते हुए न्याय की गुहार लगाई।
लिंग के आधार पर चयनात्मक बहिष्कार को कोर्ट ने बताया अनुचित
जस्टिस नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि यह सिद्धांत पारसी पुरुषों पर लागू नहीं होता, जो लैंगिक असमानता को दर्शाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जिस तरह पारसी पिताओं की संतानें जन्म के आधार पर धर्म का लाभ उठाती हैं, वही अधिकार महिलाओं को भी मिलना चाहिए। अदालत ने कहा कि धर्म जन्म से प्राप्त होता है और विवाह के बाद भी यह महिला का आंतरिक अधिकार बना रहता है। यह चयनात्मक बहिष्कार संवैधानिक मूल्यों और महिलाओं की गरिमा के विरुद्ध प्रतीत होता है।


