Maharashtra News: बॉम्बे हाई कोर्ट ने किशोर न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम में हालिया संशोधनों को संवैधानिक रूप से वैध करार दिया है। न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजुषा देशपांडे की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अब जिला मजिस्ट्रेटों के पास गोद लेने की कार्यवाही पर निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार होगा। अदालत ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें न्यायिक शक्तियों को कार्यकारी अधिकारियों को सौंपने पर आपत्ति जताई गई थी।
न्यायिक शक्तियों के हस्तांतरण पर अदालती रुख
अदालत दो दंपतियों द्वारा दायर उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिन्होंने केंद्र सरकार के उस निर्णय को चुनौती दी थी जिसमें ‘न्यायालय’ शब्द को ‘जिला मजिस्ट्रेट’ से बदल दिया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि गोद लेना एक गंभीर न्यायिक कार्य है, जिसे किसी कार्यकारी अधिकारी को नहीं सौंपा जाना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस आशंका को पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा कि जिला मजिस्ट्रेट बच्चों के कल्याण के लिए निर्णय लेने में सक्षम हैं।
गोद लेने की प्रक्रिया में गति लाने का उद्देश्य
हाई कोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि कानून में यह बदलाव गोद लेने की प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित और तेज बनाने के उद्देश्य से किया गया है। वर्तमान में कानूनी औपचारिकताओं के कारण गोद लेने के मामलों में काफी देरी होती थी, जिसे अब जिला स्तर पर डीएम की निगरानी में शीघ्र हल किया जा सकेगा। पीठ ने स्पष्ट किया कि संशोधित प्रावधानों के तहत भावी माता-पिता की पात्रता निर्धारित करना जिला मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र में है।
विशेषज्ञता की कमी के दावों को किया खारिज
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि कार्यकारी अधिकारियों के पास इस तरह के संवेदनशील मामलों को संभालने के लिए आवश्यक विशेषज्ञता नहीं होती। इस पर बेंच ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं की यह धारणा गलत है कि जिला मजिस्ट्रेट बच्चों के हित में कार्य नहीं कर सकते। अदालत ने दोहराया कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत गोद लेने के लिए एक वैध आदेश अनिवार्य है और डीएम इस प्रक्रिया को कानूनी रूप से पूरा करने के लिए पूरी तरह उपयुक्त हैं।


