New Delhi News: सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि एफआईआर दर्ज न होने की स्थिति में नागरिक सीधे उच्च न्यायालय का रुख नहीं कर सकते। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने न्यायिक अनुशासन पर जोर देते हुए कहा कि कानूनी उपचारों के उपलब्ध रहते हुए ‘शॉर्टकट’ अपनाना उचित नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मिलने वाली शक्तियां ‘असाधारण’ स्थितियों के लिए सुरक्षित हैं।
अनुच्छेद 226 और उच्च न्यायालय की सीमाएं
उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 226 की व्याख्या करते हुए कहा कि उच्च न्यायालयों के पास रिट जारी करने का व्यापक अधिकार जरूर है, लेकिन इसका उपयोग विवेकपूर्ण होना चाहिए। पीठ के अनुसार, पुलिस की लापरवाही के हर मामले में सीधे रिट याचिका स्वीकार करना न्यायिक मर्यादा के प्रतिकूल है। असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग केवल तभी किया जाना चाहिए जब स्थिति अत्यंत गंभीर हो या कानून द्वारा निर्धारित सभी वैकल्पिक रास्ते पूरी तरह बंद हो चुके हों।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) का अनिवार्य क्रम
अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) का हवाला देते हुए न्याय पाने के लिए एक क्रमिक ढांचा निर्धारित किया है। सबसे पहले धारा 173(1) के तहत संबंधित थाना प्रभारी को अपराध की सूचना दी जानी चाहिए। यदि पुलिस एफआईआर दर्ज करने से इनकार करती है, तो नागरिक को धारा 173(4) के तहत जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) को शिकायत भेजनी चाहिए। इन दो चरणों के बाद ही आगे की कानूनी कार्यवाही संभव है।
मजिस्ट्रेट की शक्ति और बॉम्बे हाई कोर्ट का मामला
यदि पुलिस अधीक्षक के हस्तक्षेप के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, तो पीड़ित को धारा 175(3) के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज करानी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के एक पुराने आदेश को रद्द करते हुए यह स्पष्ट संदेश दिया कि वैधानिक उपचारों को दरकिनार करना उचित नहीं है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि कानून में मौजूद प्रभावी और कुशल विकल्पों का पालन करना न्यायिक अनुशासन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।


