अब समुद्र में बैक्टीरिया बनेंगे ‘पावर हाउस’: वैज्ञानिकों ने बनाई कभी न खत्म होने वाली सेल्फ-चार्जिंग बैटरी

National News: वैज्ञानिकों ने ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐसा चमत्कार कर दिखाया है, जो आने वाले समय में बैटरी चार्ज करने की अवधारणा को पूरी तरह बदल सकता है। मिशिगन टेक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी बैटरी विकसित की है, जिसे न तो सॉकेट से चार्ज करने की जरूरत है और न ही इसे बदलने की। यह तकनीक समुद्र की गहराइयों में रहने वाले सूक्ष्मजीवों (बैक्टीरिया) का उपयोग करके बिजली पैदा करती है। यह ‘सेल्फ-रिफ्यूलिंग’ बैटरी भविष्य में समुद्री अनुसंधान और रक्षा प्रणालियों के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है।

माइक्रोबियल फ्यूल सेल (MFC) तकनीक का कमाल

यह पूरी तकनीक ‘माइक्रोबियल फ्यूल सेल’ (MFC) पर आधारित है। सरल शब्दों में कहें तो, यह सिस्टम समुद्र के पानी में मौजूद उन बैक्टीरिया का इस्तेमाल करता है जो कार्बनिक पदार्थों को अपना भोजन बनाते हैं। भोजन पचाने की प्रक्रिया के दौरान ये सूक्ष्मजीव इलेक्ट्रॉन छोड़ते हैं। शोधकर्ताओं ने एक ऐसा ढांचा तैयार किया है जिससे ये इलेक्ट्रॉन एनोड से कैथोड की ओर बहने लगते हैं, जिससे निरंतर बिजली का प्रवाह शुरू हो जाता है। जब तक समुद्र में बैक्टीरिया और कार्बनिक पदार्थ मौजूद रहेंगे, यह बैटरी खुद को चार्ज करती रहेगी।

चुनौतियां और एक्टिवेटेड कार्बन का अभिनव प्रयोग

समुद्र के खारे पानी में बिजली पैदा करना एक कठिन कार्य है, क्योंकि वहां खुले पानी की तुलना में कार्बनिक पदार्थ कम और ऑक्सीजन अधिक होती है। इस बाधा को दूर करने के लिए शोधकर्ताओं ने ‘ग्रेन्युलेटेड एक्टिवेटेड कार्बन’ का प्रयोग किया है। यह पदार्थ समुद्री कचरे को एक स्थान पर इकट्ठा करता है और बैक्टीरिया को पनपने के लिए सुरक्षित आधार प्रदान करता है। इससे ऑक्सीजन की मौजूदगी के बावजूद बिजली उत्पादन की प्रक्रिया बिना रुके जारी रहती है, जो इस प्रोजेक्ट की एक बड़ी तकनीकी सफलता है।

सफल परीक्षण और भविष्य की रक्षा प्रणालियां

इस क्रांतिकारी सिस्टम का सफल परीक्षण अमेरिका की चेसापीक और गैल्वेस्टन खाड़ी में किया जा चुका है। ट्रायल के दौरान चार में से तीन इकाइयों ने बिना किसी रुकावट के बिजली पैदा की। अमेरिकी रक्षा एजेंसी DARPA के ‘BLUE’ प्रोग्राम के तहत विकसित इस तकनीक का उपयोग अब नौसेना के डिफेंस सेंसर्स, भूकंप मापने वाले यंत्रों और समुद्री जीवों की निगरानी के लिए किया जाएगा। इससे महंगे और खतरनाक अंडरवॉटर ऑपरेशंस की जरूरत खत्म हो जाएगी, क्योंकि इन उपकरणों को सालों तक बिना मानवीय सहायता के चलाया जा सकेगा।

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