New Delhi News: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। वैश्विक परिस्थितियों के कारण भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 19 पैसे की भारी गिरावट के साथ 95.50 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। साल 2026 की शुरुआत से ही रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी निवेशकों के बाजार से पैसा निकालने के चलते भारतीय मुद्रा की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और रुपये की गिरावट
खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक बाजार में आपूर्ति बाधित होने का डर सता रहा है। इसके चलते ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80% तेल आयात करता है, जिससे तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग अनियंत्रित रूप से बढ़ जाती है। अमेरिकी राष्ट्रपति के कड़े रुख ने निवेशकों को डरा दिया है, जिसके परिणामस्वरूप वे उभरते बाजारों से अपना निवेश निकालकर सुरक्षित विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।
शेयर बाजार में हाहाकार: निवेशकों के डूबे करोड़ों
रुपये की कमजोरी और वैश्विक अनिश्चितता का सीधा असर भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला है। मंगलवार को सेंसेक्स और निफ्टी भारी गिरावट के साथ खुले और दिन भर संभल नहीं पाए। कारोबार के अंत में सेंसेक्स 1,456 अंक टूटकर 74,559 पर बंद हुआ, वहीं निफ्टी में 436 अंकों की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। पिछले केवल चार कारोबारी सत्रों के भीतर ही सेंसेक्स लगभग 3,500 अंक और निफ्टी करीब 1,000 अंक तक गिरकर निवेशकों को बड़ा झटका दे चुके हैं।
सर्राफा बाजार में सोने और चांदी की भारी तेजी
जहां एक ओर शेयर बाजार और रुपया गिर रहा है, वहीं सुरक्षित निवेश के रूप में सोने और चांदी की कीमतों में रिकॉर्ड तेजी आई है। दिल्ली सर्राफा बाजार में 10 ग्राम सोने का भाव 1,500 रुपये बढ़कर 1,56,800 रुपये के स्तर पर पहुंच गया। चांदी की कीमतों में तो जबरदस्त उछाल देखा गया, जहां यह 12,000 रुपये महंगी होकर 2,77,000 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की ऐतिहासिक कमजोरी ने घरेलू स्तर पर कीमती धातुओं को मजबूती दी है।
आर्थिक चुनौतियों के बीच भविष्य की राह
वर्तमान वैश्विक संकट ने भारत के आयात बिल को बढ़ा दिया है, जिससे व्यापार घाटे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। यदि खाड़ी देशों में स्थिति जल्द सामान्य नहीं होती है, तो तेल की कीमतें और अधिक बढ़ सकती हैं, जो सीधे तौर पर महंगाई को बढ़ावा देंगी। सरकार और रिजर्व बैंक स्थिति पर कड़ी नजर रख रहे हैं ताकि रुपये की गिरावट को थामा जा सके। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते फिलहाल बाजार में स्थिरता आने के संकेत बेहद कम नजर आ रहे हैं।

