National News: देशभर में अपराधियों की बढ़ती सक्रियता और उनके बदलते तौर-तरीकों पर लगाम लगाने के लिए अब भारतीय पुलिस और रेलवे सुरक्षा एजेंसियां हाईटेक तकनीक का कवच तैयार कर रही हैं। संदिग्धों की पहचान और उनके पुराने आपराधिक रिकॉर्ड को चंद सेकंड में खंगालने के लिए ‘फेस रिकग्निशन सिस्टम’ पर आधारित अत्याधुनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए जा रहे हैं। इसमें निदान, नफीस (NAFIS), क्राइम मैक और सीसीटीएनएस (CCTNS) जैसे 10 बड़े डिजिटल सिस्टम शामिल हैं। इन सभी प्लेटफॉर्म्स के एकीकरण से अब अपराधियों का बच निकलना नामुमकिन होगा।
1700 थानों का बनेगा डिजिटल नेटवर्क
सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करने के पहले चरण में देश के 1700 से अधिक महत्वपूर्ण थानों को इस नेटवर्क से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इस महत्वाकांक्षी योजना में बिहार के मुजफ्फरपुर जैसे प्रमुख जिलों के साथ-साथ देशभर के बड़े रेलवे स्टेशन, जीआरपी थाने और आरपीएफ पोस्ट शामिल किए गए हैं। अधिकारियों के अनुसार, इस केंद्रीकृत नेटवर्क के सक्रिय होने के बाद किसी भी अपराधी की पूरी ‘कुंडली’ केवल एक क्लिक पर उपलब्ध होगी, जिससे अंतरराज्यीय गिरोहों पर नकेल कसी जा सकेगी।
चेहरा स्कैन करते ही दिखेगा पूरा इतिहास
नई तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसका फेस मैचिंग सिस्टम है। रेलवे स्टेशन या संवेदनशील इलाकों में लगे सीसीटीवी कैमरों के जरिए जैसे ही किसी संदिग्ध का चेहरा स्कैन होगा, उसका पूरा इतिहास सामने आ जाएगा। इसमें दर्ज मुकदमे, गिरफ्तारी, जेल से रिहाई की तारीख, कोर्ट केस और वर्तमान गतिविधियों की सटीक जानकारी शामिल होगी। यही नहीं, अपराधी के परिवार, स्थायी पते और मोबाइल नंबर के साथ-साथ उसके दूसरे राज्यों के कनेक्शन की जानकारी भी डेटाबेस में तुरंत उपलब्ध हो जाएगी।
13 साल का डेटाबेस हो रहा है अपडेट
रेलवे बोर्ड और पुलिस मुख्यालय ने वर्ष 2013 में ही अपराधियों का केंद्रीकृत डेटाबेस तैयार करने के निर्देश दिए थे। अब 2026 तक के 13 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद, पुरानी धुंधली तस्वीरों को बदला जा रहा है और 2014-15 के बाद के नए रिकॉर्ड अपलोड किए जा रहे हैं। विभिन्न एजेंसियां अब अपराधियों के फिंगरप्रिंट और केस हिस्ट्री को डिजिटल रूप में अपडेट कर रही हैं। इस आधुनिक प्रणाली से जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और पुलिस की कार्यक्षमता में कई गुना बढ़ोतरी होगी।
सुरक्षा एजेंसियों का होगा एकीकरण
इस डिजिटल नेटवर्क से केवल जिला पुलिस ही नहीं, बल्कि आरपीएफ, जीआरपी, सेना, एसएसबी और सीआरपीएफ जैसी केंद्रीय एजेंसियों को भी जोड़ा जा रहा है। इससे अपराधी के राज्य बदलने या पहचान छिपाकर रहने की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। विशेषकर ट्रेनों में सक्रिय मोबाइल चोरों, नशाखुरानी गिरोहों और लूटपाट करने वाले बदमाशों की निगरानी आसान होगी। डेटाबेस के आपस में जुड़े होने से विभिन्न राज्यों की पुलिस के बीच समन्वय मजबूत होगा और अपराधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जा सकेगी।
डिजिटल पहचान से बदलेगी कानून व्यवस्था
पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि जिस तरह आम नागरिकों के लिए पहचान पत्र महत्वपूर्ण हैं, उसी तरह अपराधियों की डिजिटल कुंडली अपराध नियंत्रण में गेम चेंजर साबित होगी। पहले किसी अपराधी का रिकॉर्ड निकालने में कई दिनों का समय बर्बाद होता था, लेकिन अब यह काम कुछ ही सेकंड में स्क्रीन पर पूरा हो जाएगा। यह तकनीक न केवल जांच को तेज करेगी, बल्कि अपराधों के सफल अनावरण में भी मददगार साबित होगी। आने वाले समय में यह तकनीक देश की कानून व्यवस्था का चेहरा पूरी तरह बदल देगी।

