New Delhi News: भारत में गर्मी के मौसम के साथ ही जायद फसलों की बुवाई और खरीफ की तैयारी तेज हो गई है। इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वदेशी उत्पादों के उपयोग और जैविक खादों को बढ़ावा देने की विशेष अपील की है। वर्तमान में भारत रासायनिक खादों और उनके कच्चे माल के लिए विदेशों पर अत्यधिक निर्भर है। इस आयात के कारण देश का कीमती विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से खर्च हो रहा है, जिसे रोकने के लिए सरकार अब प्राकृतिक और जैविक खेती पर जोर दे रही है।
विदेशी मुद्रा पर बढ़ता बोझ और आयात का गणित
भारत अपनी रासायनिक खाद की जरूरतों को पूरा करने के लिए चीन, सऊदी अरब और मोरक्को जैसे देशों पर निर्भर है। आंकड़ों के अनुसार, साल 2022-23 में खाद आयात पर 17.21 बिलियन डॉलर खर्च किए गए थे। अनुमान है कि 2025-26 तक यह आंकड़ा 1.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। भारी विदेशी खर्च को कम करने के लिए सरकार आयातित रसायनों के विकल्प तलाश रही है, ताकि अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे इस अनावश्यक वित्तीय दबाव को कम किया जा सके।
कच्चे माल के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता
भारतीय कृषि प्रणाली में यूरिया, डीएपी और पोटाश की मांग पिछले कुछ दशकों में काफी बढ़ी है। सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देश में खाद उत्पादन के लिए आवश्यक 86 प्रतिशत रॉक फॉस्फेट विदेशों से आता है। इसी तरह, म्यूरिएट ऑफ पोटाश का 100 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस का 78 प्रतिशत हिस्सा आयात किया जाता है। विशेष रूप से चीन से भारत लगभग 73.71 प्रतिशत रसायनों का आयात करता है, जो रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से एक बड़ी चुनौती है।
सब्सिडी का बढ़ता ग्राफ और बजटीय आवंटन
केंद्र सरकार किसानों को सस्ती दरों पर खाद उपलब्ध कराने के लिए भारी सब्सिडी प्रदान करती है। केमिकल्स और फर्टिलाइजर्स मंत्रालय के अनुसार, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से यह राशि सीधे पहुंचाई जाती है। साल 2022-23 में यह सब्सिडी 1.68 लाख करोड़ रुपये के उच्च स्तर पर पहुंच गई थी। हालांकि 2024-25 में इसके 1.24 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, लेकिन फिर भी यह सरकारी खजाने पर एक बड़ा बोझ बना हुआ है, जिसे कम करना अनिवार्य है।
जैविक खादों के उपयोग से आत्मनिर्भरता की ओर
बढ़ते आयात खर्च और रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभावों को देखते हुए सरकार अब पारंपरिक कृषि पद्धतियों की ओर लौटने का सुझाव दे रही है। पहले भारतीय किसान पूरी तरह गोबर और पारंपरिक खादों पर निर्भर थे, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती थी। प्रधानमंत्री की ताजा अपील का मुख्य उद्देश्य रसायनों पर निर्भरता घटाकर स्वदेशी संसाधनों का उपयोग बढ़ाना है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि किसानों की लागत में कमी आने के साथ-साथ टिकाऊ कृषि को भी बढ़ावा मिलेगा।

