New Delhi News: आधुनिक युग में मोबाइल फोन अनिवार्य आवश्यकता बन गया है, लेकिन इसका सबसे नकारात्मक प्रभाव बच्चों और युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है। यूनिसेफ (UNICEF) की एक हालिया रिपोर्ट में डिजिटल पेरेंटिंग एक्सपर्ट डॉ. जैकलीन नेसी ने खुलासा किया है कि बच्चों का सोशल मीडिया से चिपके रहना महज एक संयोग नहीं है। दरअसल, सोशल मीडिया ऐप्स को मनोवैज्ञानिक रूप से इस तरह डिजाइन किया गया है कि उपयोगकर्ता, विशेषकर बच्चे, घंटों तक स्क्रीन पर बने रहें। यह ‘डिजिटल एडिक्शन’ बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।
सोशल मीडिया ऐप्स की ‘डिजाइन ट्रिक्स’ को समझें
डॉ. जैकलीन नेसी के अनुसार, टेक कंपनियां कई ऐसे फीचर्स का उपयोग करती हैं जो मानवीय मस्तिष्क को बार-बार ऐप खोलने के लिए मजबूर करते हैं। इसमें ‘इनफिनिट स्क्रॉल’ सबसे प्रमुख है, जहां फीड कभी खत्म नहीं होती। इसके अलावा ‘ऑटो-प्ले’ फीचर वीडियो को अपने आप चलाता रहता है, जिससे उपयोगकर्ता का प्रवाह नहीं टूटता। नोटिफिकेशन, लाइक्स, व्यूज और ‘स्ट्रीक्स’ जैसे फीचर्स बच्चों में एक तरह की प्रतिस्पर्धा और रिवॉर्ड की भावना पैदा करते हैं। यही कारण है कि बच्चे समय के बोध के बिना लगातार फोन का इस्तेमाल करते रहते हैं।
चालाक एल्गोरिदम और विकसित होता बाल मस्तिष्क
सोशल मीडिया का एल्गोरिदम उपयोगकर्ता की पसंद और नापसंद का बारीकी से विश्लेषण करता है। यह उन पोस्ट और वीडियो को प्राथमिकता देता है जिन पर बच्चा अधिक समय बिताता है। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि बच्चों और किशोरों का मस्तिष्क अभी विकास की प्रक्रिया में होता है, इसलिए उनमें आत्म-नियंत्रण (Self-Control) की क्षमता कम होती है। वे सोशल रिवॉर्ड्स जैसे कमेंट्स और लाइक्स के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। यदि वे ऑनलाइन गतिविधियों में शामिल नहीं होते, तो उन्हें ‘अकेलेपन’ का डर (FOMO) सताने लगता है, जो उन्हें ऐप से जोड़े रखता है।
मानसिक स्वास्थ्य और दैनिक जीवन पर प्रभाव
सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रभाव बच्चों की नींद, खेलकूद, पढ़ाई और आपसी रिश्तों पर पड़ता है। जो बच्चे भावनात्मक रूप से संवेदनशील हैं, उनमें इसके कारण तनाव और चिंता बढ़ सकती है। यदि बच्चा सोशल मीडिया के कारण अपना होमवर्क अधूरा छोड़ रहा है, परिवार से दूरी बना रहा है या स्कूल में एकाग्रता खो रहा है, तो यह खतरे की घंटी है। यह आभासी दुनिया धीरे-धीरे वास्तविक जीवन की जगह लेने लगती है, जिससे बच्चों का सामाजिक और व्यावहारिक कौशल प्रभावित होने लगता है।
अभिभावकों के लिए एक्सपर्ट के तीन मुख्य सुझाव
डॉ. जैकलीन नेसी माता-पिता को इस समस्या से निपटने के लिए तीन प्रभावी रणनीतियां अपनाने की सलाह देती हैं। सबसे पहले, बच्चों से बिना डांटे खुलकर बात करें और उन्हें ऐप्स की डिजाइन ट्रिक्स के बारे में शिक्षित करें। दूसरा, घर में ‘स्क्रीन टाइम’ की स्पष्ट सीमाएं तय करें और परिवार के साथ बिताए जाने वाले समय को अनिवार्य बनाएं। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण, माता-पिता स्वयं फोन का संतुलित उपयोग कर बच्चों के लिए एक रोल मॉडल बनें। याद रखें, माता-पिता की सक्रिय भूमिका ही बच्चों को एक स्वस्थ डिजिटल भविष्य प्रदान कर सकती है।

