नाबालिगों से जघन्य अपराध करवा रहे संगठित गिरोह: दिल्ली हाई कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज कर की तल्ख टिप्पणी

New Delhi News: दिल्ली हाई कोर्ट ने हत्या के एक मामले में वयस्क (Adult) के तौर पर मुकदमे का सामना कर रहे एक नाबालिग को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया की पीठ ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में अपीलकर्ता के साथ केवल उसकी उम्र के आधार पर नरमी बरतना गलत होगा। अदालत ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि संगठित गिरोह कानूनी सुरक्षा का दुरुपयोग कर नाबालिगों से जघन्य वारदातें करवा रहे हैं।

सामाजिक कल्याण कानूनों के दुरुपयोग पर कोर्ट की चिंता

सुनवाई के दौरान पीठ ने समाज की कड़वी सच्चाई का जिक्र करते हुए कहा कि संगठित गिरोह एनडीपीएस और मकोका जैसे कड़े कानूनों के बावजूद सक्रिय हैं। ये अपराधी सामाजिक कल्याण के लिए बने कानूनों का फायदा उठाकर नाबालिगों को ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। अदालत ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था ऐसी स्थिति से अपनी आंखें नहीं फेर सकती जहां बच्चों के जरिए गंभीर अपराधों को अंजाम दिलाया जा रहा है। यह प्रवृत्ति समाज की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन चुकी है।

जमानत पर रहते हुए किया दूसरा मर्डर

अदालत ने आरोपी के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए उसे राहत देने से मना कर दिया। रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी पहले से ही हत्या के एक अन्य मामले में जमानत पर था, तभी उसने इस वर्तमान हत्या को अंजाम दिया। इसके अलावा वह बदरपुर थाने में दर्ज एक तीसरे आपराधिक मामले में भी शामिल है। पीठ ने माना कि आरोपी के खिलाफ एक वयस्क के तौर पर मुकदमा चलाने के फैसले को चुनौती नहीं दी गई है, इसलिए उसकी गंभीरता को सामान्य नाबालिग की तरह नहीं देखा जा सकता।

दिल्ली पुलिस की आशंकाओं को मिली मान्यता

दिल्ली पुलिस ने जमानत याचिका का पुरजोर विरोध करते हुए दलील दी कि यदि आरोपी को रिहा किया गया, तो वह प्रत्यक्षदर्शियों को डरा या धमका सकता है। पुलिस ने अदालत को बताया कि घटना के सीसीटीवी फुटेज और चश्मदीद गवाह मौजूद हैं जिनकी जांच अभी लंबित है। कोर्ट ने पुलिस की इस आशंका को जायज ठहराया कि बाहर आने पर आरोपी अन्य कुख्यात अपराधियों के संपर्क में आ सकता है, जिससे जांच प्रक्रिया और सार्वजनिक सुरक्षा दोनों प्रभावित होने का खतरा रहेगा।

गंभीर अपराधों में उम्र की ढाल नहीं मिलेगी

आरोपी के वकील ने तर्क दिया था कि किशोर न्याय कानून के तहत अपराध की गंभीरता और पिछला रिकॉर्ड प्रासंगिक नहीं होना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कोई बच्चा गंभीर अपराधों में बार-बार संलिप्त पाया जाता है और उस पर वयस्क की तरह मुकदमा चल रहा हो, तो परिस्थितियां बदल जाती हैं। 2024 में बदरपुर में दर्ज इस प्राथमिकी और पिछले कृत्यों को देखते हुए अदालत ने उसे न्यायिक हिरासत में ही रखने का आदेश जारी किया है।

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