Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य की सुक्खू सरकार को एक बड़ा कानूनी झटका दिया है। अदालत ने ‘हिमाचल प्रदेश भर्ती और सरकारी कर्मचारियों की सेवा की शर्त अधिनियम, 2024’ को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने शनिवार को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने एक साथ 445 याचिकाओं का निपटारा करते हुए कर्मचारियों के पक्ष में आदेश दिया। इस फैसले से प्रदेश के हजारों सरकारी कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है।
संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन और कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में स्पष्ट किया कि इस अधिनियम की धारा 3, 5 और 9 सीधे तौर पर भारतीय संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ हैं। खंडपीठ के अनुसार, इन विवादित धाराओं को हटाने के बाद कानून में कोई सार्थक प्रावधान शेष नहीं बचता है। इसी आधार पर पूरे अधिनियम को ही निरस्त करना न्यायसंगत समझा गया। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा इस कानून के आधार पर अब तक की गई सभी कार्रवाइयां पूरी तरह अमान्य और असंवैधानिक मानी जाएंगी।
कर्मचारियों से वसूली पर लगी रोक और तीन महीने में भुगतान का आदेश
कोर्ट के आदेश के बाद अब सरकार कर्मचारियों को दिए गए वित्तीय लाभ वापस नहीं ले सकेगी। अदालत ने कर्मचारियों से होने वाली किसी भी प्रकार की वसूली या लाभ रोकने के पुराने आदेशों को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे अदालतों के पिछले फैसलों के अनुरूप सभी पात्र कर्मचारियों को उनके वित्तीय लाभ तीन महीने के भीतर प्रदान करें। इससे कर्मचारियों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित होने का रास्ता साफ हो गया है।
अनुबंध और नियमित सेवा की गणना का पूरा विवाद
यह कानूनी लड़ाई मुख्य रूप से उन हजारों कर्मचारियों से जुड़ी थी जिनकी नियुक्ति 2003 के बाद अनुबंध के आधार पर हुई थी। इन कर्मियों को बाद में नियमित तो किया गया, लेकिन उनकी अनुबंध अवधि को वरिष्ठता या पेंशन जैसे लाभों के लिए नहीं जोड़ा गया। कर्मचारियों ने पहले सुप्रीम कोर्ट से भी इस मामले में जीत हासिल की थी। इसके बावजूद सुक्खू सरकार ने 2024 में नया अधिनियम लाकर पुराने अदालती आदेशों के प्रभाव को खत्म करने का प्रयास किया था, जिसे हाईकोर्ट ने अनुचित माना है।
न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में दखल देना सरकार को पड़ा भारी
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी थी कि सरकार को कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन वह न्यायिक फैसलों को पलटने के लिए कानून का सहारा नहीं ले सकती। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि किसी भी न्यायिक निर्णय को केवल कानूनी प्रक्रिया से ही बदला जा सकता है। सरकार विधायी शक्तियों का उपयोग करके कोर्ट के आदेशों को बेअसर नहीं कर सकती। यह फैसला न केवल हिमाचल बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी एक नजीर साबित होगा जहाँ सेवा नियमों में बदलाव किए जाते हैं।
हजारों परिवारों में खुशी की लहर और भविष्य की राह
हाईकोर्ट के इस निर्णय के बाद हिमाचल प्रदेश के सरकारी विभागों में कार्यरत हजारों परिवारों में खुशी का माहौल है। जिन कर्मचारियों के एरियर या वेतन वृद्धि को इस कानून की आड़ में रोका गया था, उन्हें अब उनका हक मिल सकेगा। संबंधित विभागों को अब नए सिरे से गणना करके बकाया राशि का भुगतान करना होगा। यह फैसला राज्य सरकार के लिए एक बड़ी सीख है कि कर्मचारियों के हितों और संवैधानिक मर्यादाओं के साथ किसी भी प्रकार का समझौता अदालत में टिक नहीं पाएगा।
