West Asia News: पश्चिम एशिया में ईरान पर हुए अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद पूरा इलाका जंग की आग में झुलस रहा है। इस आग की लपटों ने अब कई अहम खाड़ी देशों को भी अपनी चपेट में ले लिया है। बीते 28 फरवरी को शुरू हुए तनाव के बाद से ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात समेत कई देशों पर ताबड़तोड़ हमले किए हैं। इन हमलों में बड़े तेल व गैस प्रतिष्ठान तबाह हो गए हैं और अमेरिका खामोश दर्शक बना रहा।
इस दौरान खाड़ी देशों का भरोसा अमेरिका से लगातार कम होता जा रहा है। खासतौर पर संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई से अब अमेरिका के खिलाफ खुलकर आवाजें उठ रही हैं। यूएई के एक प्रतिष्ठित विश्लेषक और टिप्पणीकार अब्दुलखालिक अब्दुल्ला ने अमेरिकी सैन्य उपस्थिति पर सीधे-सीधे सवाल उठा दिए हैं।
अब्दुलखालिक अब्दुल्ला का चौंकाने वाला बयान
प्रसिद्ध कमेंटेटर अब्दुलखालिक अब्दुल्ला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अमीरात को अब अमेरिका की उतनी आवश्यकता नहीं रह गई है जितनी पहले हुआ करती थी। उनका मानना है कि अमेरिकी सैन्य अड्डे अब देश के लिए एक सुरक्षा कवच न होकर एक भारी बोझ बन चुके हैं।
अब्दुल्ला ने लिखा, “अब वक्त आ गया है कि अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद करने पर गंभीरता से विचार किया जाए। ये बेस अब हमारे लिए कोई रणनीतिक संपत्ति नहीं रह गए हैं, बल्कि ये एक बोझ में तब्दील हो चुके हैं।” उन्होंने आगे कहा कि हाल के युद्ध में यूएई ने अपनी सैन्य क्षमता का लोहा मनवाया है।
क्या हम खुद रक्षा करने में सक्षम नहीं?
अब्दुलखालिक अब्दुल्ला ने अपने बयान में यूएई की बढ़ती सैन्य ताकत पर जोर दिया। उन्होंने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि ईरानी आक्रामकता के दौरान अमीरात ने यह साबित कर दिया कि वह अपनी रक्षा स्वयं करने में पूरी तरह सक्षम है। उनकी यह टिप्पणी क्षेत्र के बदलते सुरक्षा समीकरणों की ओर इशारा करती है।
उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “आज मैंने रॉयटर्स से यही कहा: यूएई को अपनी रक्षा के लिए अब अमेरिका की जरूरत नहीं है। हमने ईरानी हमलों के दौरान यह प्रमाणित कर दिया है कि हम खुद को बचाने में बहुत माहिर हैं।” उनकी राय में अब यूएई की प्राथमिकता अपनी खुद की सैन्य शक्ति को और अधिक मजबूत करने पर केंद्रित होनी चाहिए।
खाड़ी देशों में क्यों बढ़ रही अमेरिका के प्रति नाराजगी?
खाड़ी देशों में अमेरिका के प्रति बढ़ते असंतोष की एक बड़ी वजह हालिया संघर्ष में वाशिंगटन की भूमिका है। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका ने ईरान पर हमला करने से पहले अपने खाड़ी सहयोगियों को कोई पूर्व सूचना नहीं दी थी। इस कारण ये देश ईरान की जवाबी कार्रवाई के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं थे।
जैसे ही युद्ध छिड़ा, ईरान ने यूएई, सऊदी अरब और अन्य पड़ोसी देशों पर मिसाइलों और ड्रोनों की बौछार शुरू कर दी। इन हमलों में न केवल अरबों डॉलर की आर्थिक क्षति हुई बल्कि कई निर्दोष नागरिकों की जानें भी गईं। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अमेरिकी सेनाएं खाड़ी देशों को बचाने में नाकाम रहीं, जिससे उनके मन में गहरी निराशा पैदा हो गई है।
अमेरिकी सैन्य ठिकानों का भविष्य अधर में
अब्दुलखालिक अब्दुल्ला जैसे वरिष्ठ विश्लेषकों की टिप्पणियां केवल व्यक्तिगत विचार नहीं हैं, बल्कि यह खाड़ी के नीति निर्माताओं के बीच पनप रही एक नई सोच को दर्शाती हैं। दशकों से यह क्षेत्र अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैन्य छत्रछाया पर निर्भर रहा है। लेकिन अब यह निर्भरता कमजोर पड़ती दिख रही है।
तेल और गैस के प्रमुख ठिकानों को पहुंचे नुकसान ने इन देशों को झकझोर कर रख दिया है। आर्थिक नुकसान के साथ-साथ सुरक्षा की गारंटी न मिलने की पीड़ा इन देशों को आत्मनिर्भरता की ओर धकेल रही है। यूएई के इस ताजा बयान से साफ संकेत मिलता है कि क्षेत्र की कूटनीति और रक्षा साझेदारियों में जल्द ही बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
