नंदीग्राम में ‘उम्र का फासला कम है’ कहकर मतदाता सूची से नाम कटे, 95% प्रभावित मुस्लिम; ममोनी बोलीं- ये कैसा नियम

West Bengal News: पूर्वी मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र में 23 अप्रैल को मतदान होना है लेकिन मोहम्मदपुर गांव की ममोनी खातून इस बार वोट नहीं डाल पाएंगी। चुनाव आयोग ने तार्किक विसंगति यानी लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के तहत ममोनी समेत 3,461 मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए हैं। इनमें से लगभग 95 प्रतिशत प्रभावित मतदाता मुस्लिम समुदाय से हैं। ममोनी का कहना है कि उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि उनकी और उनके माता-पिता की उम्र में 15 साल से कम का अंतर होना नाम काटने का आधार कैसे बन सकता है।

अजीबोगरीब नोटिस लेकर सड़क पर उतरे ग्रामीण

मोहम्मदपुर गांव में दर्जनों महिलाएं और पुरुष चुनाव आयोग का नोटिस हाथ में लेकर बाहर आ गए। 30 वर्षीय जियारुल खां बताते हैं कि उनके पिता अजीज खां ने दो शादियां की थीं जिनसे कुल दस बच्चे हुए। आयोग के नोटिस में कहा गया है कि उनके पिता को छह से अधिक लोगों ने पिता बताया है इसलिए जियारुल जांच के दायरे में हैं। जियारुल का सवाल है कि अगर उनके पिता के नौ और बच्चे हैं तो क्या वे किसी दूसरे व्यक्ति को अपना पिता बताएंगे।

वहीं 60 वर्षीय मोती खान ने बताया कि उनके केवल पांच बच्चे हैं फिर भी आयोग ने नोटिस में छह बच्चे दिखाकर तीन नाम काट दिए। मोती खान ने थकान भरे स्वर में कहा कि वे सबूत देते-देते हार गए हैं और अब सरकार की बात का कोई भरोसा नहीं रह गया है। पूरे इलाके में मतदाताओं में भ्रम और आक्रोश का माहौल है क्योंकि अधिकांश लोगों को नोटिस में बताए गए कारण समझ से परे लग रहे हैं।

क्या कहता है चुनाव आयोग का तर्क

पूर्वी मेदिनीपुर के जिला निर्वाचन अधिकारी निरंजन कुमार ने इस मामले में ज्यादा कुछ कहने से इनकार कर दिया। उन्होंने केवल इतना कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है इसलिए वे कोई टिप्पणी करने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जांच जारी है और अगर दस्तावेज सही पाए गए तो संबंधित मतदाताओं के नाम फिर से सूची में शामिल कर लिए जाएंगे।

चुनाव आयोग ने इसी वर्ष जनवरी में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल कर लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के पक्ष में तर्क रखे थे। आयोग के अनुसार कुछ मामलों में एक ही व्यक्ति को 50 से 200 से अधिक लोगों ने पिता बताया है जिसे वैज्ञानिक रूप से वैध मैपिंग नहीं माना जा सकता। आयोग ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 का हवाला देते हुए कहा कि भारत में औसत परिवार का आकार 4.4 है इसलिए छह से अधिक बच्चों के मामले संदिग्ध हैं।

विशेषज्ञों ने आयोग के आधार को बताया अतार्किक

कोलकाता स्थित सबर इंस्टीट्यूट के निदेशक सबीर अहमद चुनाव आयोग की दलीलों से सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि अनाथालयों में रहने वाले बच्चों के लिए एक ही फादर फिगर का नाम दर्ज कराना आम बात है जिसे आयोग स्वयं मान्यता देता है। इसके अलावा एआई तकनीक के कारण भी एक जैसे नाम वाले व्यक्तियों के डेटा आपस में मिल सकते हैं जिससे गलत विसंगतियां सामने आती हैं।

सबीर अहमद ने बाल विवाह की समस्या का हवाला देते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में यह स्थिति ऐतिहासिक रूप से खराब रही है। ऐसे में माता-पिता और संतान की उम्र में 15 साल से कम का अंतर असामान्य नहीं है। उन्होंने कहा कि रवींद्रनाथ टैगोर के दस भाई-बहन थे इसलिए आज के पुराने आंकड़ों पर नए सर्वे का फॉर्मूला लागू करना गलत है। भाषा के अनुवाद में भी गड़बड़ी होती है क्योंकि बांग्ला नामों को एआई से अंग्रेजी में बदलने पर वर्तनी बदल जाती है।

नंदीग्राम में 95 प्रतिशत प्रभावित क्यों हैं मुस्लिम

सबर इंस्टीट्यूट के विश्लेषण के अनुसार नंदीग्राम में जिन 3,461 मतदाताओं के नाम काटे गए उनमें से 3,270 मुस्लिम समुदाय से हैं जबकि केवल 191 गैर-मुस्लिम प्रभावित हुए हैं। यह आंकड़ा इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र में 70 प्रतिशत से अधिक आबादी गैर-मुस्लिमों की है। सबीर अहमद का कहना है कि एसडीडी (अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लिकेट) के आधार पर नाम काटने की प्रक्रिया में सभी धर्मों के मतदाता जनसंख्या अनुपात में प्रभावित हुए थे।

लेकिन लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लागू होते ही मुस्लिम मतदाताओं का अनुपात अचानक 95 प्रतिशत तक पहुंच गया। विशेषज्ञों के अनुसार मुस्लिम समुदाय में शैक्षिक पिछड़ापन और गरीबी के कारण दस्तावेजीकरण की स्थिति कमजोर है। नामों की वर्तनी में मामूली अंतर या संयुक्त परिवारों में बड़ी संख्या में बच्चे होने जैसे कारणों ने इस समुदाय को ज्यादा प्रभावित किया है।

सियासी आरोप-प्रत्यारोप और कोर्ट की निगाह

भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रदेश अध्यक्ष रह चुके दिलीप घोष का कहना है कि बांग्लादेश से मुस्लिम घुसपैठियों के नाम ही ज्यादा कटे हैं क्योंकि वे सही दस्तावेज पेश नहीं कर पाए। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता फिरहाद हाकिम का आरोप है कि लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के तहत जानबूझकर मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाया गया है। ममता बनर्जी अपनी चुनावी रैलियों में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठा रही हैं।

नंदीग्राम सीट इस बार भी सुर्खियों में है क्योंकि पिछले चुनाव में यहां भाजपा के सुवेंदू अधिकारी ने ममता बनर्जी को महज 1,956 वोटों से हराया था। सुवेंदू अधिकारी से जब मुस्लिम मतदाताओं के नाम कटने का कारण पूछा गया तो उन्होंने पलटकर कहा कि जाकर उन्हीं मतदाताओं से पूछिए। कोलकाता विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हिमाद्रि चटर्जी मानते हैं कि इस विवाद ने चुनावी बहस की दिशा बदल दी है और बाकी मुद्दे पीछे छूट गए हैं।

भविष्य की नागरिकता को लेकर बढ़ा डर

जिन मुस्लिम मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं उनके मन में अब एक नया डर पैदा हो गया है। जियारुल खां ने चिंता जताते हुए कहा कि आज वोटर लिस्ट से नाम हटाया गया है तो कल यही लोग उन्हें बांग्लादेशी घुसपैठिया घोषित कर सकते हैं। उनका कहना है कि बांग्ला भाषा और मुस्लिम पहचान के चलते उन पर अवैध नागरिक होने का ठप्पा लगाना आसान हो जाएगा।

प्रभावित मतदाता अब अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे दशकों से यहां रह रहे हैं और अचानक नाम काट दिए जाने से उनकी पूरी नागरिकता पर सवालिया निशान लग गया है। हालांकि चुनाव आयोग का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद दोषमुक्त पाए जाने वाले लोगों के नाम बहाल कर दिए जाएंगे लेकिन मतदान की तारीख नजदीक होने के कारण इन लोगों के वोट डालने की संभावना कम ही है।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
/ month
placeholder text

Hot this week

Topics

Related Articles

Popular Categories