India News: ब्रिटिश शासन के दौरान बने ‘सिविल लाइंस’ जैसे इलाकों का नाम और अवधारणा अब इतिहास बन सकती है। केंद्र सरकार ने देश में औपनिवेशिक दौर की बची हुई परंपराओं और नामों को बदलने की दिशा में काम शुरू कर दिया है। इसी क्रम में ‘सिविल लाइंस’ को भी समीक्षा के लिए चिन्हित किया गया है। सरकार का उद्देश्य औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर भारतीय पहचान को मजबूत करना है। जनवरी में प्रधानमंत्री मोदी ने मंत्रियों और अधिकारियों से ऐसी प्रथाओं के भारतीय विकल्प सुझाने को कहा था।
19वीं सदी में ब्रिटिश अफसरों के लिए बसाए गए थे ये इलाके
‘सिविल लाइंस’ की शुरुआत 19वीं सदी में हुई थी। ये इलाके खास तौर पर ब्रिटिश अफसरों के रहने के लिए बनाए गए थे, जहां बेहतर सुविधाएं और ढांचा होता था। ये क्षेत्र सत्ता के करीब होने का प्रतीक माने जाते थे। आज भी ‘सिविल लाइंस’ दिल्ली समेत उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र के कई शहरों में मौजूद हैं। पहले ये इलाके पुराने शहरों या बाजारों से अलग होते थे और इनकी अपनी विशेष पहचान थी।
शहरी योजनाकारों के अनुसार बदल चुकी है इनकी पहचान
शहरी योजनाकारों के अनुसार, उस समय शहरों का विकास इस तरह किया जाता था कि एक तरफ सैन्य छावनी (कैंटोनमेंट) होती थी और दूसरी तरफ सिविल लाइंस। यह शहरों के नियोजित विकास का हिस्सा था। पूर्व डीडीए आयुक्त एके जैन का कहना है कि अब इन इलाकों में काफी बदलाव आ चुका है। पहले जहां बंगले होते थे, वहां अब बहुमंजिला इमारतें बन गई हैं। ये इलाके अब शहर का सामान्य हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि नाम बदलने का ज्यादा प्रभाव नहीं होगा।
सरकार की मुहिम: रेस कोर्स रोड से लेकर सिविल लाइंस तक
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई सड़कों और जगहों के नाम बदले हैं। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली की ‘रेस कोर्स रोड’ का नाम बदलकर ‘लोक कल्याण मार्ग’ किया गया है। अब सिविल लाइंस की बारी है। सूत्रों के अनुसार, सरकार एक बड़ा अभियान चला रही है, जिसके तहत ब्रिटिश शासन की निशानियों को पहचानकर उन्हें भारतीय संस्कृति के अनुरूप बदला जाएगा। हालांकि, अभी इस बात पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है कि सिविल लाइंस का नया क्या नाम रखा जाएगा। सरकार का प्रयास देश की गुलामी की मानसिकता को पूरी तरह समाप्त करने का है।
