World News: अमेरिका और ईरान के बीच करीब सवा महीने चले युद्ध के बाद हुए सीजफायर को आगे बढ़ाने के प्रयासों को बड़ा झटका लगा है। ईरान ने पाकिस्तान में होने वाली दूसरे दौर की बातचीत से हटने की घोषणा कर दी है। तेहरान का आरोप है कि अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य में नाकाबंदी कर रखी है और ज्यादा शर्तें लाद रहा है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी है कि अगर ईरान ने समझौता नहीं किया तो उसके पावर प्लांट और पुल उड़ा दिए जाएंगे।
शांति वार्ता से पीछे हटा तेहरान, अमेरिकी नाकाबंदी को बताया वजह
अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल को दो हफ्ते का सीजफायर हुआ था, जो 22 अप्रैल को खत्म हो रहा है। इससे पहले ही ईरान ने बातचीत से दूरी बना ली है। ईरान ने वाशिंगटन पर आरोप लगाया कि उसकी अत्यधिक मांगें, अवास्तविक अपेक्षाएं, बार-बार रुख बदलना और ईरानी बंदरगाहों के पास अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी युद्धविराम का उल्लंघन है। ईरान के प्रथम उपराष्ट्रपति मोहम्मद रेजा आरेफ ने अमेरिकी रुख को ‘बचकाना और असंगत’ करार दिया। उन्होंने कहा कि धमकी भरी भाषा के साथ ईरान से बातचीत की उम्मीद करना बेकार है।
ट्रंप के बयान और अमेरिकी कार्रवाई ने बढ़ाया तनाव
रविवार को ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर चेतावनी दी कि अगर ईरान अमेरिका का प्रस्तावित सौदा नहीं मानता तो वे उसके नागरिक बुनियादी ढांचे को नष्ट कर देंगे। उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान के हर पावर प्लांट और हर ब्रिज को नॉक आउट कर देगा। इसके बाद रविवार देर रात अमेरिकी नौसेना ने ईरान के बंदरगाह की ओर आ रहे एक ईरानी जहाज पर फायरिंग कर उसे अपने कब्जे में ले लिया। तेहरान ने जवाब में अमेरिकी जहाजों पर ड्रोन हमला किया, जिसे अमेरिका ने नाकाम कर दिया। इन घटनाओं के बाद बातचीत की संभावना लगभग समाप्त हो गई है।
पाकिस्तान वार्ता अधर में, युद्ध की आशंका फिर बढ़ी
ईरान के इस अचानक फैसले ने सभी को चौंका दिया है। कुछ दिन पहले ईरानी सूत्रों ने बताया था कि प्रतिनिधिमंडल मंगलवार को पाकिस्तान पहुंच सकता है। व्हाइट हाउस ने भी कहा था कि अमेरिकी वरिष्ठ अधिकारी इस्लामाबाद के लिए रवाना होने को तैयार हैं। पाकिस्तान ने इसके लिए सुरक्षा कड़ी कर दी थी। लेकिन अब ईरान के रुख ने सब कुछ पटरी से उतार दिया है। ईरान के संसद स्पीकर मोहम्मद बागेर कालिबाफ पहले कूटनीति के पक्ष में थे, लेकिन ट्रंप की धमकियों ने उनका मन बदल दिया है। अब यह देखना होगा कि क्या यह शांति वार्ता किसी मुकाम पर पहुंच पाती है या फिर से युद्ध शुरू हो जाता है।
