पाकिस्तान का अजीब विरोधाभास: एक ओर अमेरिका-ईरान वार्ता का मेजबान, दूसरी ओर बिजली की भीषण कमी से त्रस्त आम जनता

Pakistan News: पाकिस्तान इन दिनों एक अजीबोगरीब विरोधाभास से जूझ रहा है। एक तरफ देश की राजधानी इस्लामाबाद वैश्विक कूटनीति के केंद्र में बनी हुई है। इसी सप्ताह अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते को लेकर अहम बातचीत का एक और दौर पाकिस्तान में आयोजित होने की संभावना है। पाकिस्तान पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने के प्रयासों में अपनी मध्यस्थता की भूमिका को मजबूती से आगे बढ़ा रहा है।

इस कूटनीतिक सक्रियता के उलट जमीनी हकीकत बेहद चुनौतीपूर्ण है। देश की आम जनता गंभीर बिजली संकट की मार झेल रही है। नागरिकों को रोजाना घंटों की बेहद लंबी बिजली कटौती का सामना करना पड़ रहा है। हालात यह हैं कि सरकार के बार-बार दिए गए आश्वासन भी धरे के धरे रह गए हैं। सरकार ने कटौती को दो से तीन घंटे तक सीमित रखने का भरोसा दिलाया था।

हालांकि हकीकत इस वादे से काफी अलग और कठोर निकली। पिछले सप्ताह देश के अधिकांश शहरी और ग्रामीण इलाकों में बिजली आपूर्ति पूरी तरह ठप रही। कई स्थानों पर लगातार निर्धारित समय से अधिक की अवधि तक अंधेरा पसरा रहा। विद्युत वितरण प्रणाली की कमर इस कदर टूटी कि अधिकारियों को भारी मात्रा में कमी स्वीकार करनी पड़ी। देश में पीक आवर्स के दौरान लगभग चार हजार पांच सौ मेगावाट बिजली की भारी कमी दर्ज की गई।

कूटनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान की बढ़ती सक्रियता

इस गंभीर आंतरिक संकट के बीच पाकिस्तान का विदेशी मोर्चा लगातार सक्रिय नजर आ रहा है। सेना प्रमुख जनरल सैयद आसिम मुनीर हाल ही में तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर तेहरान गए थे। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य पड़ोसी देश ईरान के साथ द्विपक्षीय सुरक्षा और व्यापारिक संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ करना बताया गया। दोनों देशों के शीर्ष सैन्य नेतृत्व ने सीमाई प्रबंधन और क्षेत्रीय स्थिरता पर विस्तार से बातचीत की।

वहीं दूसरी ओर राजनीतिक मोर्चे पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी लगातार क्षेत्रीय दौरे कर रहे हैं। वह आर्थिक सहायता और निवेश के अवसर तलाशने के लिए कतर और सऊदी अरब की यात्रा पर गए। सऊदी अरब के युवराज और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान के साथ उनकी मुलाकात को विशेष तौर पर काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस बैठक में पाकिस्तान की आर्थिक चुनौतियों और सऊदी निवेश को बढ़ावा देने के रास्ते तलाशे गए।

पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक हैसियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी एक बड़ा संकेत दिया है। उन्होंने कहा कि यदि ईरान के साथ कोई नया समझौता होता है तो वह स्वयं इस्लामाबाद आ सकते हैं। हालांकि फिलहाल यह यात्रा कार्यक्रम अंतिम रूप से तय नहीं किया गया है। यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि हो सकती है।

एलएनजी की भारी कमी बना बिजली संकट का सबसे बड़ा कारण

बिजली संकट के मूल कारणों पर गौर करें तो अधिकारी एक मुख्य वजह सामने रख रहे हैं। बिजली उत्पादन इकाइयों को चलाने के लिए तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की आपूर्ति में भारी गिरावट आई है। पाकिस्तान को अपने गैस आधारित बिजली संयंत्रों को पूरी क्षमता से चलाने के लिए कम से कम चार टैंकर एलएनजी की अनिवार्य रूप से जरूरत होती है। लेकिन वैश्विक बाजार में बढ़ती कीमतों और कम आपूर्ति के कारण यह कोटा पूरा नहीं हो पा रहा है।

खाड़ी देशों से अपेक्षित मात्रा में गैस न मिलने के कारण कई प्रमुख बिजलीघरों का उत्पादन या तो रोक दिया गया है या फिर काफी कम कर दिया गया है। सरकार के पास महंगी एलएनजी खरीदने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार का भी अभाव है। ऐसे में सरकार मजबूरन लोड शेडिंग का सहारा ले रही है। आयातित ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता ने पाकिस्तान के ऊर्जा क्षेत्र की बुनियादी कमजोरियों को एक बार फिर से उजागर कर दिया है।

जलविद्युत उत्पादन में अप्रत्याशित गिरावट ने बढ़ाई मुश्किलें

बिजली आपूर्ति को लेकर मौजूदा संकट के पीछे एक और बड़ी वजह जलविद्युत उत्पादन में आई भारी गिरावट है। आम तौर पर पाकिस्तान की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का लगभग पच्चीस से तीस प्रतिशत हिस्सा जलविद्युत परियोजनाओं से प्राप्त होता है। लेकिन इस बार प्राकृतिक कारणों और प्रशासनिक फैसलों की वजह से स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। पानी की भारी कमी के कारण बड़े बांधों से उत्पादन घट गया है।

इस बाबत मिली जानकारी के अनुसार सिंधु नदी प्रणाली प्राधिकरण ने बांधों के जलाशयों से पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं छोड़ा। इस फैसले के पीछे तर्क दिया गया कि प्रांतों की सिंचाई संबंधी जरूरतें सबसे अधिक प्राथमिकता पर थीं। फसलों की सुरक्षा के लिए पानी बचाने के चक्कर में बिजली उत्पादन को गौण मान लिया गया। यह पूरी घटना पाकिस्तान के अंदर गहराती प्रशासनिक अव्यवस्था और विभागीय समन्वय की कमी को स्पष्ट रूप से इंगित करती है।

विभिन्न सरकारी संस्थानों के बीच तालमेल का अभाव अक्सर गंभीर समस्याओं को और भी अधिक विकराल बना देता है। एक विभाग ने कृषि को बचाने के लिए पानी रोका तो दूसरे ने उर्जा क्षेत्र की बर्बादी पर ध्यान नहीं दिया। इस विभागीय असंगति का खामियाजा अंततः आम नागरिकों को गर्मी और अंधेरे में बैठकर चुकाना पड़ रहा है। लोगों को उम्मीद है कि सरकार जल्द ही सिंचाई और बिजली के बीच एक संतुलित नीति तैयार करेगी।

वैश्विक मध्यस्थ की भूमिका और आंतरिक चुनौतियों का दोहरा दबाव

पाकिस्तान पिछले कई दशकों से अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। वह खुद को दक्षिण एशिया, समृद्ध अरब दुनिया और शक्तिशाली पश्चिमी देशों के बीच एक सेतु के रूप में पेश करता आया है। वर्तमान भू-राजनीतिक माहौल में वह एक बार फिर इसी ऐतिहासिक भूमिका को सफलतापूर्वक निभाने का प्रयास कर रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता की मेजबानी इसी रणनीति का एक हिस्सा मानी जा रही है।

लेकिन देश की आंतरिक स्थितियां किसी भी बाहरी गौरव को फीका करने के लिए काफी हैं। बढ़ती बेरोकटोक महंगाई दर पहले ही आम आदमी की कमर तोड़ रही है और अब इसके ऊपर से बेहद कष्टदायक बिजली संकट ने जनता की परेशानियों को चरम पर पहुंचा दिया है। घंटों बिजली गुल रहने से न केवल घरेलू जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है बल्कि उद्योग और व्यापार भी ठप पड़ गए हैं।

पाकिस्तान की जनता इस समय दोहरे यथार्थ का सामना कर रही है। एक ओर मीडिया में देश के कूटनीतिक कद का बखान हो रहा है तो दूसरी ओर उन्हें पंखे और बल्ब के लिए भी तरसना पड़ रहा है। जनता को अब अपनी सरकार से केवल अंतरराष्ट्रीय मंच पर सफलता की कहानियों की नहीं बल्कि बुनियादी सुविधाओं की बहाली की आस है। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार इस बार स्थिति की गंभीरता को समझते हुए जल्द ही ठोस कदम उठाएगी और बिजली की सुचारू आपूर्ति सुनिश्चित करेगी।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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