Uttarakhand News: उत्तराखंड के जंगलों में लगी भीषण आग अब केवल पेड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसानी सेहत और पर्यावरण के लिए “साइलेंट किलर” बन चुकी है। नैनीताल और आसपास के इलाकों में पिछले दस दिनों से जारी वनाग्नि के कारण जहरीली गैसों का उत्सर्जन खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, वातावरण में ब्लैक कार्बन और कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा में दस गुना से भी अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। 15 फरवरी से शुरू हुए इस फायर सीजन में अब तक प्रदेश के 120 हेक्टेयर से अधिक जंगल जलकर राख हो चुके हैं।
ब्लैक कार्बन में 10 गुना उछाल, सांस लेना हुआ दूभर
आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान एवं शोध संस्थान (एरीज) के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आग की घटनाओं से पहले पहाड़ों पर ब्लैक कार्बन का स्तर न्यूनतम था, जो अब 15-20 नैनोग्राम प्रति मीटर क्यूब तक पहुंच गया है। सामान्य दिनों में यह महज एक से दो नैनोग्राम रहता था। इसी तरह, पार्टिकुलेट मैटर (PM 2.5) का स्तर भी बढ़कर 25 के पार चला गया है। ये सूक्ष्म कण सांस के जरिए सीधे फेफड़ों तक पहुंचकर गंभीर बीमारियों का कारण बन रहे हैं।
ग्लेशियरों के लिए ‘विलेन’ बन रही कार्बन मोनोऑक्साइड
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र सिंह के मुताबिक, ब्लैक कार्बन लकड़ी के अधूरे जलने से निकलता है और वायुमंडल में दो सप्ताह तक स्थिर रह सकता है। यह न केवल तापमान बढ़ा रहा है, बल्कि हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की मुख्य वजह भी बन रहा है। वहीं, आग से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड हवा में दो महीने तक मौजूद रहती है। धूल और धातु के कणों के मिश्रण से फेफड़ों से संबंधित समस्याएं और श्वसन तंत्र के रोगों का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
फायर सीजन की 198 घटनाएं, बेकाबू हुई वनाग्नि
15 जून तक चलने वाला यह फायर सीजन वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक वनाग्नि की 198 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। गढ़वाल रीजन सबसे अधिक प्रभावित है, जहां 154 घटनाओं में 90 हेक्टेयर से ज्यादा जंगल स्वाहा हो चुके हैं। कुमाऊं रीजन और वन्यजीव क्षेत्रों में भी आग ने भारी तबाही मचाई है। चटक धूप और बढ़ता तापमान आग की तीव्रता को और अधिक बढ़ा रहा है, जिससे वन संपदा के साथ-साथ जैव विविधता को भी अपूरणीय क्षति पहुंच रही है।
