Delhi NCR News: दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे देश में मानसून का इंतजार गर्मी से राहत के लिए किया जाता है, लेकिन एक नए अंतरराष्ट्रीय शोध ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, मानसून के दौरान बढ़ने वाली उमस भरी गर्मी, शुष्क लू के मुकाबले 125 प्रतिशत तक अधिक जानलेवा हो सकती है। यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग, लीड्स और आईआईटीम पुणे के इस साझा अध्ययन में 84 वर्षों के मौसम के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। शोधकर्ताओं ने अब उस ‘किलर पैटर्न’ को डिकोड कर लिया है, जिससे इस खतरे की सटीक चेतावनी 28 दिन पहले ही दी जा सकेगी।
वेट-बल्ब तापमान: क्यों पसीना न सूखना बन जाता है जानलेवा?
वैज्ञानिक भाषा में इस स्थिति को ‘वेट-बल्ब तापमान’ कहा जाता है। यह शुष्क गर्मी से कहीं ज्यादा खतरनाक है क्योंकि जब हवा में नमी का स्तर बहुत अधिक होता है, तो मानव शरीर से पसीना नहीं सूख पाता। पसीना न सूखने के कारण शरीर का आंतरिक तापमान कम नहीं हो पाता, जिससे कुछ ही घंटों में हीटस्ट्रोक या कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम फेल होने जैसी स्थितियां पैदा हो जाती हैं। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में मानसून के सक्रिय होते ही यह खतरा अचानक बढ़ जाता है।
उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदानी इलाकों में नमी का तांडव
शोध के मुख्य लेखक डॉ. अक्षय देवरास के मुताबिक, लोग अक्सर गर्मियों की शुष्क लू से तो बचते हैं, लेकिन उमस को गंभीरता से नहीं लेते। जब मानसून सक्रिय होता है, तो गंगा के मैदानी इलाकों, विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार में नमी का स्तर जानलेवा सीमा तक पहुंच जाता है। वहीं, मानसून में ब्रेक आने पर यह उमस भरी गर्मी का खतरा प्रायद्वीपीय भारत और तटीय क्षेत्रों की ओर बढ़ने लगता है। यह शोध आने वाले समय में हीट एक्शन प्लान तैयार करने में मील का पत्थर साबित होगा।
दिल्ली-एनसीआर के लिए रेड अलर्ट: GRAP की तर्ज पर होगी कार्रवाई
दिल्ली की घनी आबादी और कंक्रीट के जंगल ‘हीट आइलैंड’ बनाते हैं। यमुना के पास वाले इलाकों जैसे आईटीओ और पूर्वी दिल्ली में नमी का स्तर बहुत ज्यादा रहता है। यहां तापमान 35-38 डिग्री होने पर भी उमस के कारण 45 डिग्री जैसा महसूस होता है। 28 दिन पहले मिलने वाली चेतावनी से सरकार को ‘ग्रेप’ की तर्ज पर श्रमिकों के लिए ऑरेंज या रेड अलर्ट जारी करने और निर्माण कार्यों पर रोक लगाने का पर्याप्त समय मिल जाएगा, जिससे हजारों जानें बचाई जा सकेंगी।
