Himachal News: हिमाचल प्रदेश में लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा राज्य के शीर्ष नेतृत्व को देखकर लगाया जा सकता है। वर्तमान मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार तक, राजनीति के इन बड़े चेहरों ने अपना पहला पाठ पंचायतों और नगर निकायों से ही सीखा है। हिमाचल में इस समय शहरी निकाय और पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट तेज है। ऐसे में यह समझना दिलचस्प है कि कैसे स्थानीय निकायों की जीत ने इन नेताओं के लिए विधानसभा और मुख्यमंत्री कार्यालय के दरवाजे खोले।
पार्षद की दहलीज से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक सुक्खू का सफर
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का राजनीतिक उत्कर्ष किसी मिसाल से कम नहीं है। उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत शिमला नगर निगम के एक छोटे वार्ड ‘छोटा शिमला’ से की थी। वहां से वह दो बार पार्षद चुने गए। छात्र राजनीति में एनएसयूआई के साथ सक्रिय रहने के बाद नगर निगम के अनुभवों ने उन्हें जमीन से जोड़े रखा। इसके बाद उन्होंने नादौन विधानसभा क्षेत्र का रुख किया। चार बार विधायक चुने जाने के बाद आज वह प्रदेश की कमान संभाल रहे हैं।
शांता कुमार: एक पंच जो बना देश का दिग्गज नेता
प्रदेश के कर्नधारों में शामिल पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार की यात्रा भी प्रेरणादायक है। उन्होंने 1963 में गढजमूला पंचायत में एक साधारण पंच के रूप में अपनी पारी शुरू की थी। इसके बाद वह पंचायत समिति और कांगड़ा जिला परिषद के अध्यक्ष पद तक पहुंचे। स्थानीय शासन के इसी अनुभव ने उन्हें दो बार राज्य का मुख्यमंत्री और केंद्र में कद्दावर मंत्री बनाया। उनकी सफलता यह प्रमाणित करती है कि पंचायती राज ही भारतीय लोकतंत्र की असली पाठशाला और आधार है।
अनिरुद्ध और लखनपाल: जिला परिषद और निगम से विधानसभा तक
कैबिनेट मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने मशोबरा वार्ड से दो बार जिला परिषद चुनाव जीतकर अपनी प्रशासनिक क्षमता साबित की थी। जिला परिषद अध्यक्ष रहने के बाद उन्होंने कसुम्पटी सीट से विधानसभा में कदम रखा। इसी तरह भाजपा विधायक इंद्रदत्त लखनपाल शिमला नगर निगम के कच्ची घाटी वार्ड से पार्षद रहे। उनकी जमीनी पकड़ को देखते हुए उन्हें बड़सर से चुनावी मैदान में उतारा गया। स्थानीय निकायों में काम करने का अनुभव इन नेताओं को जनता की नब्ज समझने में मदद करता है।
वीरेंद्र कंवर और किशोरी लाल की जमीनी सक्रियता
पूर्व मंत्री वीरेंद्र कंवर ने राजनीति की पहली सीढ़ी पंचायत उपप्रधान और फिर प्रधान बनकर चढ़ी थी। कुटलैहड़ विधानसभा क्षेत्र से उनकी जीत इसी प्रारंभिक संघर्ष का परिणाम रही। दूसरी ओर बैजनाथ के कांग्रेस विधायक किशोरी लाल ने तो रिकॉर्ड पांच बार अपनी पंचायत में प्रधान और उपप्रधान का दायित्व संभाला। वर्ष 2012 में विधायक बनने से पहले उन्होंने दशकों तक ग्रामीण विकास के कार्यों को करीब से देखा और स्थानीय स्तर पर अपनी मजबूत पैठ बनाई।
डॉ. बिंदल और संजय अवस्थी: नगर परिषद का अनुभव
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने सोलन नगर परिषद के पार्षद और अध्यक्ष के रूप में राजनीति शुरू की थी। सोलन और नाहन विधानसभा क्षेत्रों से उनकी जीत के पीछे नगर निकाय का लंबा अनुभव रहा है। इसी प्रकार अर्की के विधायक संजय अवस्थी भी सोलन नगर परिषद में पार्षद के रूप में जनसेवा कर चुके हैं। इन नेताओं ने दिखाया है कि छोटे निकायों में काम करने से नेतृत्व के गुण विकसित होते हैं, जो राज्य स्तर पर काम आते हैं।
युवा और महिला विधायकों की नई खेद भी सक्रिय
वर्तमान विधानसभा में कई ऐसे युवा और महिला चेहरे हैं जो हाल ही में जिला परिषद से आए हैं। चुराह के विधायक डॉ. हंसराज और कांगड़ा के पवन काजल लंबे समय तक जिला परिषद सदस्य रहे। इसी प्रकार लाहुल स्पीति की अनुराधा राणा, आनी के लोकेंद्र कुमार और गगरेट के चैतन्य शर्मा भी जिला परिषद से सीधे मुख्यधारा की राजनीति में चमके हैं। आनी और लाहुल स्पीति जैसी दुर्गम सीटों पर स्थानीय निकायों का अनुभव चुनावी जीत का बड़ा आधार बना।
पंचायत समिति और परिषद से विधानसभा का रास्ता
बिलासपुर सदर के पूर्व विधायक बंबर ठाकुर और वर्तमान विधायक सुभाष ठाकुर ने भी जिला परिषद के जरिए अपनी जगह बनाई थी। कुटलैहड़ से देवेंद्र भुट्टो ने पंचायत समिति सदस्य के तौर पर 2000 में शुरुआत की थी। चिंतपूर्णी के गणेशदत्त भरवाल 1982 में पंचायत सदस्य रहे थे। ये सभी नाम इस बात की गवाही देते हैं कि हिमाचल की राजनीति में सफल होने के लिए स्थानीय शासन और ग्रामीण संसद का अनुभव एक महत्वपूर्ण ‘क्वालीफिकेशन’ बन चुका है।
