हिमाचल में बिजली उपभोक्ताओं को ‘अंधेरे’ की धमकी? स्मार्ट मीटर पर छिड़ा घमासान, जानें क्या है पूरा विवाद!

Himachal News: हिमाचल प्रदेश में स्मार्ट मीटर लगाने की मुहिम अब बड़े विवाद में तब्दील हो गई है। बिजली कर्मचारियों और पेंशनरों के संयुक्त मंच ने राज्य बिजली बोर्ड प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। संगठनों का आरोप है कि प्रबंधन उपभोक्ताओं पर अनावश्यक दबाव बना रहा है। बिजली बोर्ड के इस कठोर रवैये से जनता में आक्रोश है। स्मार्ट मीटर न लगवाने पर बिजली काटने की धमकियां दी जा रही हैं। कर्मचारी संगठनों ने इसे पूरी तरह जनविरोधी करार दिया है।

24 घंटे का अल्टीमेटम और अवैध धमकियों का आरोप

विद्युत पेंशनर फोरम और जेएसी के नेताओं ने एक संयुक्त बयान जारी कर प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। वरिष्ठ उपाध्यक्ष कुलदीप खरवाड़ा और सह संयोजक हीरा लाल वर्मा ने कहा कि बिजली बोर्ड एक सेवा संस्थान है। उपभोक्ताओं को मात्र 24 घंटे के भीतर स्मार्ट मीटर लगवाने के लिए मजबूर करना सरासर गलत है। उन्होंने चेतावनी दी कि बिजली काटने का डर दिखाना अवैध है। संगठन ने इस तरह के दबावपूर्ण व्यवहार को तुरंत बंद करने की मांग की है।

तकनीकी सुधार का समर्थन लेकिन पारदर्शिता पर सवाल

प्रशांत शर्मा और नितीश भद्वाज ने स्पष्ट किया कि वे आधुनिकीकरण के विरोधी नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संगठनों का कहना है कि उपभोक्ताओं को तकनीकी मानकों और बिलिंग प्रणाली की जानकारी नहीं दी गई। डेटा सुरक्षा और शिकायत निवारण की व्यवस्था भी अब तक अस्पष्ट है। जब तक उपभोक्ताओं को परियोजना की लागत और लाभ के बारे में जागरूक नहीं किया जाता, तब तक इसे लागू करना अनुचित है।

2500 करोड़ का भारी-भरकम बोझ और निजीकरण की आशंका

कर्मचारी मंच ने दावा किया है कि स्मार्ट मीटर परियोजना से राज्य की जनता पर लगभग 2500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। उन्होंने सवाल उठाया कि 1800 करोड़ की लागत वाली यह परियोजना अचानक 2600 करोड़ तक कैसे पहुंच गई? इसके अलावा, उन्होंने बिजली बोर्ड पर निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने का आरोप भी लगाया है। महत्वपूर्ण कार्यों को निजी हाथों में सौंपने से बोर्ड की अपनी कार्यप्रणाली और भविष्य के अस्तित्व पर भी बुरा असर पड़ सकता है।

पारदर्शी नीति और संवाद की पुरजोर मांग

संयुक्त मंच ने मांग की है कि बिजली बोर्ड डराने की नीति छोड़कर संवाद का रास्ता अपनाए। उपभोक्ताओं को दिए गए सभी नोटिस और धमकियां तुरंत वापस ली जानी चाहिए। बिजली जैसी आवश्यक सेवा में डर और दबाव का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि नीति को पारदर्शी और भरोसेमंद नहीं बनाया गया, तो विरोध और तेज होगा। बिजली बोर्ड को निजी हितों का साधन बनाने के बजाय जनहित में काम करना चाहिए।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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