Himachal News: हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव के नामांकन से ठीक पहले सुक्खू सरकार ने नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अब यदि परिवार के मुखिया या ससुर का सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा है, तो उनकी बहू चुनाव नहीं लड़ सकेंगी। राज्यपाल ने इस संबंध में सरकार द्वारा लाए गए ऑर्डिनेंस को मंजूरी दे दी है। इस फैसले का सीधा असर उन महिला प्रत्याशियों पर पड़ेगा जो लंबे समय से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही थीं। सरकार ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए यह कड़ा कदम उठाया है।
बहुओं को मिलने वाली विशेष छूट अब समाप्त
पुराने प्रावधानों के तहत परिवार के मुखिया द्वारा अतिक्रमण करने पर भी बहू को चुनाव लड़ने की अनुमति थी। हालांकि बेटा, अविवाहित बेटी और दादा-दादी पहले से ही अयोग्य माने जाते थे। अब नए संशोधन के बाद बहुओं को दी गई यह छूट पूरी तरह समाप्त कर दी गई है। सरकार का तर्क है कि पंचायत स्तर पर कानून का सख्ती से पालन और अवैध कब्जों पर अंकुश लगाने के लिए यह संशोधन अनिवार्य था। इस फैसले से कई सियासी समीकरण बदल सकते हैं।
ऑर्डिनेंस पर राज्यपाल की मुहर और त्वरित कार्रवाई
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार मंगलवार शाम को इस अध्यादेश का सर्कुलर जारी किया गया था। मंत्रियों की औपचारिक सहमति के बाद इसे तुरंत मंजूरी के लिए राज्यपाल के पास भेजा गया। राजभवन के कर्मचारी विशेष रूप से फाइल लेकर सुंदरनगर पहुंचे, जहां राज्यपाल ने इस पर हस्ताक्षर किए। नामांकन प्रक्रिया शुरू होने से ऐन पहले इस अधिसूचना के जारी होने से प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। अब उम्मीदवारों को नामांकन के समय नए हलफनामे देने होंगे।
हाईकोर्ट का फैसला: आशा वर्करों के चुनाव लड़ने का रास्ता साफ
एक अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रम में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आशा कार्यकर्ताओं को बड़ी राहत दी है। अदालत ने राज्य सरकार के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें आशा कार्यकर्ताओं को चुनाव के लिए अयोग्य घोषित किया गया था। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने रीना देवी व अन्य की याचिका पर यह आदेश दिया। अब आशा वर्कर पंचायत चुनाव में उम्मीदवार के तौर पर अपना नामांकन पत्र दाखिल कर सकेंगी।
अदालत ने सरकार और चुनाव आयोग से मांगा जवाब
राज्य सरकार ने 2 मई को एक अधिसूचना जारी कर आशा कार्यकर्ताओं को ‘अंशकालिक कर्मचारी’ माना था। इसके तहत उन्हें पंचायती राज अधिनियम की धारा 122(1)(जी) के तहत चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने इसे अपने संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया। हाईकोर्ट ने अब इस मामले में सरकार और चुनाव आयोग को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई अब 1 जून को निर्धारित की गई है।
चुनाव की शुचिता और अधिकारों के बीच संतुलन
पंचायत चुनावों के बीच आए इन दोनों बड़े फैसलों ने हिमाचल की ग्रामीण राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। एक ओर सरकार अवैध कब्जों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रही है, तो दूसरी ओर अदालत ने कामगार महिलाओं के चुनावी अधिकारों की रक्षा की है। इन बदलावों के कारण अब निर्वाचन अधिकारियों को नामांकन पत्रों की जांच के दौरान अधिक सतर्कता बरतनी होगी। ग्रामीण मतदाता भी इन कानूनी बदलावों और उनके सामाजिक प्रभावों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।

