Himachal News: हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार राज्य में एक बार फिर सरकारी स्कूलों पर तालाबंदी की तैयारी में है। शिक्षा निदेशालय ने 100 और स्कूलों को बंद करने या नजदीकी संस्थानों में मर्ज करने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री को भेजा है। वर्तमान सरकार अपने कार्यकाल में अब तक लगभग 1350 स्कूल बंद कर चुकी है। इस नए फैसले से प्रदेश में एक बार फिर राजनीतिक बवाल मचने के आसार दिख रहे हैं। सरकार का तर्क है कि कम नामांकन वाले स्कूल चलाना व्यावहारिक नहीं है।
शून्य या पांच से कम छात्र संख्या वाले संस्थानों पर गाज
शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने इस नए प्रस्ताव की पुष्टि करते हुए विस्तृत जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि जिन स्कूलों में विद्यार्थियों का नामांकन शून्य है या पांच से कम छात्र पढ़ रहे हैं, उन्हें ही इस सूची में शामिल किया गया है। विभाग का मानना है कि बेहद कम संख्या वाले स्कूलों पर संसाधन खर्च करना उचित नहीं है। इन स्कूलों को अब नियमों के तहत नजदीकी बड़े स्कूलों के साथ जोड़ दिया जाएगा ताकि संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके।
कठिन भौगोलिक क्षेत्रों के स्कूलों को मिलेगी राहत
सरकार ने साफ किया है कि सभी स्कूलों पर एक जैसा फैसला नहीं थोपा जाएगा। राज्य के दूरदराज और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में स्थित स्कूलों के लिए विशेष रियायत दी जा सकती है। यदि किसी स्कूल के बंद होने से छात्रों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, तो उस मामले पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। शिक्षा मंत्री के अनुसार, कुछ स्कूलों का दर्जा कम करने यानी डाउनग्रेड करने का विकल्प भी सरकार के पास अभी विचाराधीन रखा गया है।
कैबिनेट की मंजूरी के बिना मुख्यमंत्री लेंगे अंतिम निर्णय
प्रशासनिक रूप से इस फैसले के लिए अब दोबारा कैबिनेट बैठक बुलाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। राज्य कैबिनेट पहले ही मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को स्कूल बंद करने या मर्ज करने के निर्णय लेने के लिए अधिकृत कर चुकी है। मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) से हरी झंडी मिलते ही स्कूल शिक्षा निदेशालय इस संबंध में आधिकारिक आदेश जारी कर देगा। सरकार इस कदम को शिक्षा व्यवस्था में सुधार और वित्तीय घाटे को कम करने की कवायद के रूप में देख रही है।
विपक्ष और स्थानीय जनता के कड़े विरोध की आशंका
संस्थानों को बंद करने के मुद्दे पर हिमाचल में पहले भी काफी विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं। विपक्ष लगातार सरकार को इस मुद्दे पर घेरता रहा है और इसे जनविरोधी कदम करार दिया है। स्थानीय ग्रामीणों का तर्क है कि सरकारी स्कूल बंद होने से गरीब बच्चों के लिए शिक्षा पाना कठिन हो जाएगा। सरकार के इस निर्णय से जहां प्रशासनिक ढांचे में कसावट आने की उम्मीद है, वहीं दूरदराज के इलाकों में बुनियादी शिक्षा की पहुंच पर सवाल उठ रहे हैं।

