Uttarakhand News: उत्तराखंड में उपनल (UPNAL) कर्मचारियों की तैनाती वाले पदों को लेकर कार्मिक विभाग के एक ताजा आदेश ने नई प्रशासनिक और सियासी बहस छेड़ दी है। राज्य सरकार ने अब उन सभी खाली पदों पर सीधी भर्ती के लिए अधियाचन भेजने की प्रक्रिया को बदल दिया है, जहां वर्तमान में उपनल कर्मी कार्यरत हैं। नए निर्देशों के अनुसार, अब किसी भी विभाग को इन पदों पर नियमित भर्ती प्रक्रिया शुरू करने से पहले कार्मिक, वित्त और न्याय विभाग से अनिवार्य रूप से अनुमति लेनी होगी। इस कदम से हजारों आउटसोर्स कर्मचारियों के भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है।
भर्ती प्रक्रिया में जटिलता और सरकार की नई रणनीति
कार्मिक विभाग के इस आदेश को प्रशासनिक रूप से एक बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। अब तक विभागाध्यक्ष रिक्त पदों पर सीधी भर्ती के लिए सीधे तौर पर अधियाचन भेजते रहे हैं, लेकिन अब यह प्रक्रिया बहुस्तरीय और जटिल हो गई है। जानकारों का मानना है कि सरकार किसी भी संभावित कानूनी विवाद से बचने के लिए यह रास्ता अपना रही है। चूंकि उपनल कर्मियों का मामला लंबे समय से न्यायालय में विचाराधीन रहा है, इसलिए सरकार अब हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही है ताकि भविष्य में कोई न्यायिक अड़चन न आए।
नियमितीकरण की मांग और कानूनी पेचीदगियों का इतिहास
प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों में हजारों उपनल कर्मी वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ये कर्मचारी मूल रूप से सैनिक कल्याण विभाग के माध्यम से आउटसोर्स आधार पर तैनात किए जाते हैं। साल 2018 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इन कर्मचारियों के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिसमें उन्हें नियमित करने और समान कार्य के लिए समान वेतन देने के निर्देश दिए गए थे। हालांकि, राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिससे नियमितीकरण की राह में लंबे समय से गतिरोध बना हुआ है।
मुख्यमंत्री धामी की पहल और कर्मचारियों का विरोध
हाल के महीनों में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार ने उपनल कर्मियों को समान वेतन देने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाए हैं। इसके तहत कर्मचारियों के साथ नए अनुबंध करने का प्रस्ताव भी रखा गया, लेकिन कर्मचारी संगठनों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। उनका तर्क है कि अनुबंध की नई शर्तें उनकी सेवाओं को और अधिक सीमित कर देंगी, जबकि उनकी प्राथमिक मांग पूर्ण नियमितीकरण है। अब कार्मिक विभाग के नए आदेश ने कर्मचारियों के बीच असुरक्षा की भावना को और बढ़ा दिया है।
प्रशासनिक सतर्कता या कर्मचारियों के लिए नई उम्मीद?
इस नए आदेश को लेकर उपनल कर्मियों के बीच दो तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कई कर्मचारी इसे एक सकारात्मक संकेत के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि यदि सरकार सीधी भर्ती की प्रक्रिया को कठिन बनाती है, तो इससे मौजूदा अनुभवी कर्मचारियों को बनाए रखने और भविष्य में उन्हें स्थायी करने का रास्ता खुल सकता है। इसी उम्मीद के आधार पर कर्मचारी संगठनों ने एक बार फिर हाईकोर्ट के पुराने आदेशों का हवाला देते हुए अपनी मांगों को लेकर दबाव बनाना शुरू कर दिया है।
सरकार का पक्ष और कर्मचारी नेताओं की स्पष्ट चेतावनी
कैबिनेट मंत्री खजान दास ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि यह निर्णय कर्मचारियों के हितों की रक्षा और भविष्य की बाधाओं को दूर करने के लिए लिया गया है। वहीं, उपनल कर्मचारी नेता विनोद कवि ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि सरकार को अब टालमटोल के बजाय एक स्पष्ट और स्थायी नीति बनानी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी है कि वर्षों से सेवा दे रहे कर्मचारियों को इस तरह अस्थिरता के माहौल में रखना अन्यायपूर्ण है। फिलहाल, इस आदेश ने प्रदेश की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है।
