युद्धों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था का डंका, यूएन की चौंकाने वाली रिपोर्ट- 2026 और 2027 में सबसे तेज दौड़ेगा भारत, 6.4% से 6.6% रहेगी विकास दर

Business News: इजरायल-ईरान संघर्ष हो या रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक तनाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट ने दुनिया भर के विशेषज्ञों को चौंका दिया है। यूएन के आर्थिक और सामाजिक आयोग ने अपने अनुमान में कहा है कि भारत 2026 और 2027 में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना रहेगा। रिपोर्ट में इस वर्ष विकास दर 6.4 प्रतिशत और अगले वर्ष 6.6 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई है।

सोमवार को जारी यूएन एस्केप की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक परिस्थितियां भले ही प्रतिकूल हों लेकिन भारत सही राह पर अग्रसर है। रिपोर्ट में बताया गया कि वर्ष 2025 में भारत ने 7.4 प्रतिशत की शानदार विकास दर हासिल की थी। इस उपलब्धि के पीछे ग्रामीण मांग में तेज उछाल और वस्तु एवं सेवा कर की दरों में की गई कटौती को अहम कारण बताया गया है। अमेरिकी टैरिफ लगने से ठीक पहले निर्यात में आई तेजी ने भी इसे समर्थन दिया।

अमेरिकी टैरिफ का असर कितना रहा प्रभावी

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ भी भारत की आर्थिक रफ्तार को ज्यादा झटका नहीं दे पाए। अगस्त 2025 में भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक का शुल्क लागू कर दिया गया था। इसके प्रभावस्वरूप अमेरिका को होने वाले निर्यात में करीब 25 प्रतिशत की गिरावट जरूर दर्ज की गई। वर्ष की दूसरी छमाही में आर्थिक गतिविधियों में हल्की नरमी भी देखने को मिली।

इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ इस दौरान सेवा क्षेत्र ही बना रहा। रिपोर्ट में कहा गया कि दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम एशिया की अर्थव्यवस्थाएं 2025 में 5.4 प्रतिशत की दर से बढ़ीं। 2024 में यह दर 5.2 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इस पूरे क्षेत्रीय विकास में भारत की उल्लेखनीय प्रगति ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान दिया। रिपोर्ट का शीर्षक ‘एस्केप-2026’ रखा गया है।

महंगाई को लेकर आई राहत भरी खबर

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में महंगाई दर को लेकर भी भारत के लिए अच्छे संकेत दिए गए हैं। अनुमान लगाया गया है कि चुनौतीपूर्ण अंतरराष्ट्रीय हालात के बीच भी भारत में मुद्रास्फीति नियंत्रित रहेगी। विशेषज्ञों के मुताबिक वर्ष 2026 में खुदरा महंगाई दर घटकर 4.4 प्रतिशत रह सकती है। इसके अगले वर्ष 2027 में यह और मामूली गिरावट के साथ 4.3 प्रतिशत के स्तर पर आ सकती है।

हालांकि रिपोर्ट में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई को लेकर कुछ चिंताएं जरूर जताई गई हैं। व्यापार तनाव और भू-राजनीतिक अस्थिरता के चलते एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एफडीआई प्रवाह में गिरावट दर्ज की गई। वर्ष 2024 में जहां इसमें 0.6 प्रतिशत की मामूली वृद्धि हुई थी, वहीं 2025 में यह 2 प्रतिशत तक घट गया। यह स्थिति तब है जबकि वैश्विक स्तर पर एफडीआई प्रवाह में 14 प्रतिशत की जोरदार बढ़त रही।

ग्रीनफील्ड निवेश में भारत अव्वल

चिंताजनक वैश्विक रुझानों के बीच भी भारत निवेशकों के लिए एक आकर्षक गंतव्य बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार एशिया-प्रशांत क्षेत्र में ग्रीनफील्ड एफडीआई आकर्षित करने के मामले में भारत शीर्ष स्थान पर रहा। देश में इस अवधि में 50 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की गई। भारत के बाद ऑस्ट्रेलिया में 30 अरब डॉलर, दक्षिण कोरिया में 25 अरब डॉलर और कजाकिस्तान में 21 अरब डॉलर के निवेश प्रस्ताव आए।

रिपोर्ट में विदेशों से आने वाली व्यक्तिगत धनराशि यानी रेमिटेंस की भूमिका को भी रेखांकित किया गया है। एशिया और प्रशांत क्षेत्र के प्रवासी श्रमिकों द्वारा भेजी जाने वाली यह राशि लगातार बढ़ रही है। यह प्रवाह घरेलू रोजगार बाजार की कमजोरियों के प्रभाव को काफी हद तक कम करने में सहायक सिद्ध हो रहा है। भारत और फिलीपींस में लगभग 40 प्रतिशत रेमिटेंस चिकित्सा जैसे आवश्यक खर्चों पर व्यय की जाती है।

रेमिटेंस पर अमेरिकी कर बना चिंता का कारण

वर्ष 2024 में भारत 137 अरब डॉलर की रेमिटेंस प्राप्त कर दुनिया का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता देश बना था। लेकिन रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि भविष्य में इस मोर्चे पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। अमेरिका द्वारा वर्ष 2026 से विदेश भेजे जाने वाले धन पर 1 प्रतिशत कर लगाए जाने का प्रस्ताव है। यदि यह नियम लागू होता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था को इससे करारा झटका लगने की आशंका है।

रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी के आंकड़ों का हवाला देते हुए हरित रोजगार पर भी प्रकाश डाला गया है। वैश्विक स्तर पर लगभग 1.66 करोड़ हरित नौकरियां सृजित हुई हैं। इनमें से 73 लाख अकेले चीन में हैं जबकि भारत में यह संख्या 13 लाख है। शेष 25 लाख रोजगार एशिया के अन्य भागों में सृजित हुए हैं। उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना का उल्लेख करते हुए बताया गया कि यह नीति आयात पर निर्भरता घटाने में मददगार है।

पीएलआई योजना से हरित ऊर्जा को मिल रहा बढ़ावा

यूएन रिपोर्ट में भारत सरकार की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना की सफलता की सराहना की गई है। रिपोर्ट के अनुसार यह नीतिगत पहल सौर ऊर्जा, उच्च क्षमता वाली बैटरियों और ग्रीन हाइड्रोजन के घरेलू उत्पादन को प्रभावी रूप से बढ़ावा दे रही है। इस रणनीति के माध्यम से न केवल आयातित ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता कम हो रही है बल्कि नए औद्योगिक अवसरों का सृजन भी हो रहा है।

यह रिपोर्ट इस बात का प्रमाण है कि पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत की आर्थिक नीतियां सही दिशा में अग्रसर हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता और कई मोर्चों पर छिड़े युद्धों के बीच भारत की यह उपलब्धि विश्व की अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को चकित करने वाली है। फिलहाल सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि भारत आने वाली तिमाहियों में इस अनुमानित विकास दर को किस तरह हासिल करता है।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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