Bihar News: भारत और नेपाल के बीच फैली लगभग सत्रह सौ इक्यावन किलोमीटर लंबी खुली अंतरराष्ट्रीय सीमा का एक विशाल हिस्सा बिहार राज्य से सटा हुआ है। यह सीमा हिमालय की ऊंची चोटियों से लेकर सिंधु-गंगा के उपजाऊ मैदानों तक विस्तृत है। दोनों देशों के बीच नागरिकों की मुक्त आवाजाही की एक विशेष और पारंपरिक व्यवस्था सदियों से चली आ रही है। लेकिन काठमांडू की नई सरकार द्वारा हाल ही में जारी एक आदेश ने इस सीमा के शांतिपूर्ण माहौल को अचानक गर्मा दिया है।
इस फैसले के तहत भारत से खरीदकर लाए जाने वाले एक सौ नेपाली रुपये यानी लगभग तिरसठ भारतीय रुपये से अधिक मूल्य के किसी भी सामान पर भारी भरकम सीमा शुल्क वसूला जाने लगा है। इस कठोर निर्णय से भारत से कहीं अधिक नेपाल के आम नागरिकों में भारी रोष और असंतोष का माहौल व्याप्त हो गया है। बिहार और नेपाल के बीच केवल भौगोलिक सीमा ही नहीं है बल्कि बेटी-रोटी का अटूट सांस्कृतिक और पारिवारिक रिश्ता भी है। स्थानीय निवासी नेपाल के नई पीढ़ी के प्रधानमंत्री के इस फैसले से बेहद क्षुब्ध हैं और इसे रिश्तों पर आघात मान रहे हैं।
पांच राज्यों से जुड़ी है भारत-नेपाल की संवेदनशील सीमा
गौरतलब है कि भारत और नेपाल की यह खुली अंतरराष्ट्रीय सीमा देश के पांच विभिन्न राज्यों के साथ अपना स्पर्श साझा करती है। इसमें उत्तर प्रदेश के साथ सबसे अधिक पांच सौ इक्यावन किलोमीटर तथा बिहार के साथ सात सौ छब्बीस किलोमीटर लंबी सीमा रेखा शामिल है। इसके अतिरिक्त पश्चिम बंगाल में एक सौ किलोमीटर, उत्तराखंड में दो सौ पचहत्तर किलोमीटर और सिक्किम राज्य में निन्यानवे किलोमीटर की सीमा नेपाल से जुड़ी हुई है। इन विशाल सीमावर्ती क्षेत्रों में बसने वाले लाखों परिवारों की रोजी-रोटी और आजीविका पूरी तरह से इस अबाधित व्यापार पर आश्रित रही है।
इन इलाकों के लोगों के बीच गहरे पारिवारिक संबंध और साझा सांस्कृतिक मूल्य पीढ़ियों से चले आ रहे हैं। सीमा पार हो रहा यह पारंपरिक कारोबार केवल वस्तुओं का लेन-देन नहीं है बल्कि यह दोनों राष्ट्रों के बीच सामाजिक ताने-बाने की मजबूत कड़ी है। नई कस्टम नीति ने इसी बुनियादी ढांचे पर सीधी चोट की है। इस निर्णय के कारण बाजारों में आवाजाही कम हो गई है और सीमावर्ती क्षेत्रों की आर्थिक गतिविधियां लगभग ठप पड़ने की कगार पर पहुंच गई हैं। दोनों ओर के छोटे कारोबारियों और मजदूरों के सामने आजीविका का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है।
भारत और चीन के बीच संतुलन की राजनीतिक मजबूरी
इस मामले पर गहरी नजर रखने वाले भारत-नेपाल संबंधों के जानकारों का मानना है कि नेपाल की वर्तमान सरकार एक कठिन कूटनीतिक संतुलन साधने के प्रयास में जुटी हुई है। काठमांडू का वर्तमान नेतृत्व भारत और चीन दोनों ही एशियाई दिग्गजों के बीच एक मध्यम मार्ग निकालने की कोशिश कर रहा है। हालांकि उत्तरी पड़ोसी चीन से अपेक्षित आर्थिक सहयोग की उम्मीदें अधूरी हैं और वहां से मिलने वाले ऋण के बोझ को लेकर भी सरकार काफी सतर्क और सावधान है। इन्हीं दबावों के कारण नेपाल की आर्थिक और विकास नीतियां एक प्रकार की असमंजस की स्थिति से गुजर रही हैं।
नीतिगत स्तर पर दिख रही इस हिचकिचाहट और स्पष्टता के अभाव के कारण नेपाल की कई महत्वाकांक्षी विकास परियोजनाओं की गति बेहद धीमी पड़ गई है। इसमें जहां एक ओर हिमालयी राष्ट्र की गंभीर भौगोलिक चुनौतियां बाधा बन रही हैं तो वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर उपजता जन विरोध भी समस्या को जटिल बना रहा है। नई सरकार शायद विशुद्ध रूप से ‘आर्थिक लाभ’ के गणित के आधार पर निर्णय लेने का प्रयास कर रही है। परंतु यह संकीर्ण आर्थिक दृष्टिकोण जमीनी स्तर पर सदियों से चली आ रही सामाजिक वास्तविकताओं और मानवीय रिश्तों से कठोरता के साथ टकराता हुआ दिखाई पड़ रहा है।
पारंपरिक विश्वास और सहयोग की कठिन परीक्षा
फिलहाल यह पूरा विवाद केवल कस्टम ड्यूटी लगाए जाने की प्रशासनिक कार्रवाई तक ही सीमित नहीं है। यह मामला दोनों पड़ोसी देशों के बीच बने पारंपरिक आपसी विश्वास और लंबे समय से चले आ रहे सहयोगात्मक ढांचे की एक कठिन परीक्षा बनता जा रहा है। इस नीति के दूरगामी परिणाम सीमा पार व्यापार की मात्रा, लोगों के मुक्त आवागमन और साझा सांस्कृतिक संबंधों की गर्माहट पर अत्यंत गहरा और नकारात्मक प्रभाव डालने की पूरी क्षमता रखते हैं। यदि इस मुद्दे का शीघ्र समाधान नहीं निकाला गया तो यह दोनों राष्ट्रों के जनमानस के बीच दूरियां बढ़ाने का कारण बन सकता है। सीमा के दोनों छोर पर बसे लोग एक ऐसे समाधान की आस लगाए बैठे हैं जो उनकी रोजी-रोटी और पुश्तैनी संबंधों की रक्षा कर सके। स्थानीय निवासी चाहते हैं कि सरकारें उनकी जमीनी समस्याओं को समझें और पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने को सुरक्षित रखते हुए कोई व्यावहारिक रास्ता निकाला जाए।
