क्या जन्म के आधार पर भगवान को छूने से रोकना सही है? सुप्रीम कोर्ट बोला, संविधान मूकदर्शक नहीं रह सकता

Delhi News: सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर पर नौ जजों की संविधान पीठ अहम सुनवाई कर रही है। यह अदालत धार्मिक अधिकारों और महिलाओं के प्रवेश पर पुराने फैसले की समीक्षा कर रही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने पुजारियों से तीखे सवाल पूछे हैं। पीठ ने पूछा कि क्या परंपरा के नाम पर श्रद्धालु को मूर्ति छूने से रोका जा सकता है। अदालत ने कहा कि भेदभाव होने पर संविधान कभी मूकदर्शक नहीं रह सकता।

संवैधानिक नैतिकता और अछूत परंपराओं पर बहस

सुप्रीम कोर्ट के कटघरे में आस्था और संवैधानिक नैतिकता को लेकर वकीलों के बीच जोरदार बहस हुई है। साल 2018 में पांच जजों की पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी। अदालत ने माना था कि समानता के अधिकार और धार्मिक प्रथाओं के बीच टकराव को सुलझाने की जरूरत है। इसी कारण बड़ी बेंच का गठन हुआ था। आज इसी गंभीर और अहम सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लगातार जारी है।

धार्मिक आस्था और पुजारियों के अधिकार पर दलील

वरिष्ठ वकील वी.वी. गिरि ने पुजारियों के अधिकारों का पुरजोर बचाव किया। उन्होंने अदालत में कहा कि मंदिर जाने वाले श्रद्धालु को वहां की प्रथाओं में विश्वास रखना चाहिए। आगम शास्त्रों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि केवल विशेष पुजारी ही मूर्ति को छू सकते हैं। अगर कोई अन्य व्यक्ति मूर्ति को छूता है तो इसे पूरी तरह अपवित्र माना जाता है। उन्होंने कहा कि सरकारी हस्तक्षेप लोगों की गहरी आस्था का सीधा उल्लंघन होगा।

जन्म के आधार पर भेदभाव को लेकर तीखे सवाल

वकील की दलीलों पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने एक तीखा और जरूरी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि अगर कोई व्यक्ति पूरी श्रद्धा से मंदिर जाता है तो क्या होगा। जन्म के कारण उसे मूर्ति छूने की अनुमति नहीं देना बहुत गलत है। भगवान और भक्त के बीच ऐसा भेदभाव कैसे संभव है। क्या ऐसी स्थिति में संविधान उस श्रद्धालु के बचाव में आगे नहीं आएगा। जस्टिस पी.बी. वराले ने भी आस्तिक को तर्कशील होने की बात कही।

धार्मिक मामलों में अदालती दखल न होने की मांग

दोपहर की सुनवाई में वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों पर जोर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि अदालतों को अनिवार्य धार्मिक प्रथा परीक्षण को छोड़ देना चाहिए। यदि किसी प्रथा का संबंध धर्म से है, तो कोर्ट को संप्रदाय की बात माननी चाहिए। गैर-धार्मिक अदालत को इन पुरानी प्रथाओं का परीक्षण बिल्कुल नहीं करना चाहिए। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि मंदिरों में मूर्ति न छूना विशेष विधि का हिस्सा है।

अल्पसंख्यक संस्थानों के समान स्वायत्तता देने का तर्क

वकील ने संविधान के अनुच्छेद छब्बीस की तुलना अनुच्छेद तीस से की है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अल्पसंख्यक संस्थानों को सामान्य संस्थानों से अधिक स्वायत्तता मिलती है। उसी तर्ज पर सभी धार्मिक संप्रदायों को भी प्रबंधन की अधिक छूट मिलनी चाहिए। उन्होंने अदालत में साफ किया कि संविधान में प्रयुक्त नैतिकता का अर्थ बहुसंख्यक राय नहीं है। इसका सही मतलब हमेशा व्यापक संवैधानिक नैतिकता के दायरे में ही होना चाहिए।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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