Himachal News: हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के आगामी चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी चरम पर पहुंच गई है। विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने आक्रामक रुख अपनाते हुए मंगलवार को प्रदेश के सभी जिलों के लिए अपने जिला परिषद प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी है। हालांकि, यह चुनाव आधिकारिक रूप से पार्टी चुनाव चिह्न पर नहीं लड़े जाते, फिर भी भाजपा ने संगठन की पकड़ मजबूत करने के लिए यह दांव खेला है। दूसरी ओर, सत्ताधारी कांग्रेस ने किसी भी आधिकारिक प्रत्याशी की घोषणा न करने का निर्णय लिया है, जिससे चुनावी मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
कांग्रेस की ‘नो कैंडिडेट’ नीति और विधायकों का व्यक्तिगत समर्थन
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी आधिकारिक तौर पर जिला परिषद के लिए कोई चेहरा चुनावी मैदान में नहीं उतारेगी। कांग्रेस का मानना है कि विचारधारा से जुड़ा कोई भी कार्यकर्ता चुनाव लड़ सकता है। हालांकि, जमीनी स्तर पर तस्वीर कुछ और ही है। सोलन के दून और ऊना के कुटलैहड़ जैसे क्षेत्रों में कांग्रेस विधायक खुलकर अपने करीबियों को समर्थन दे रहे हैं। विधायक न केवल उन्हें प्रत्याशी बता रहे हैं, बल्कि उनके पक्ष में वोट की अपील कर चुनावी समीकरण साधने में जुटे हैं।
अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की कुर्सी के लिए भाजपा की अग्रिम तैयारी
जिला परिषद के चुनाव के बाद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चयन सबसे महत्वपूर्ण होता है, जिन्हें सरकारी वाहन और कार्यालय जैसी सुविधाएं मिलती हैं। भाजपा ने पिछली बार की तरह इस बार भी पहले ही प्रत्याशियों को अधिकृत कर दिया है, ताकि जीत के बाद नेतृत्व चयन में कोई विवाद न हो। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि पहले से तय उम्मीदवारों के जरिए जिला परिषदों पर कब्जा करना आसान होगा। भाजपा इसके लिए लगातार संगठनात्मक बैठकें कर रही है, जिसमें चुनावी रणनीति और समीकरणों को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
विधानसभा चुनाव का ‘सेमीफाइनल’ माने जा रहे हैं पंचायती राज चुनाव
इन चुनावों को राज्य में सत्ता का ‘सेमीफाइनल’ माना जा रहा है, क्योंकि इनका परिणाम आगामी विधानसभा चुनावों की दिशा तय करेगा। यही कारण है कि हर मंत्री और विधायक यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उनके क्षेत्र के प्रधान, बीडीसी सदस्य और जिला परिषद सदस्य उनके ही करीबी हों। जहां भाजपा ने उम्मीदवारों की घोषणा कर बढ़त बनाने की कोशिश की है, वहीं कांग्रेस अपनी ‘मौन’ रणनीति के जरिए निर्दलीय और प्रभावी कार्यकर्ताओं को साधने की कोशिश कर रही है। दोनों ही दलों के भीतर बैठकों और मंथन का दौर जारी है।


