Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश में 19वीं विधानसभा चुनाव से करीब आठ महीने पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रिमंडल का बहुप्रतीक्षित विस्तार कर दिया है। इस विस्तार के जरिए भाजपा ने सत्ता की ‘हैट-ट्रिक’ लगाने के लिए जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों का एक मजबूत किला तैयार किया है। समाजवादी पार्टी के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले की काट के रूप में भाजपा ने पिछड़ों और दलितों को मंत्रिमंडल में भारी प्रतिनिधित्व दिया है। इस रणनीतिक फेरबदल के बाद अब योगी सरकार के कुल 60 मंत्रियों में से 60 प्रतिशत सदस्य ओबीसी और एससी समाज से आते हैं।
ओबीसी और दलित समाज पर भाजपा का बड़ा दांव
विपक्ष की घेराबंदी को ध्वस्त करने के लिए भाजपा ने इस विस्तार में पिछड़ा वर्ग (OBC) से तीन नए मंत्री बनाए हैं और दो को प्रोन्नत किया है। वहीं, अनुसूचित जाति (SC) समाज से भी दो नए चेहरे शामिल किए गए हैं। पहली बार वाल्मीकि समाज से सुरेंद्र दलेर और पासी बिरादरी से कृष्णा पासवान को मंत्रिमंडल में जगह दी गई है। इस बदलाव के बाद उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य सहित पिछड़े समाज के मंत्रियों की संख्या अब सर्वाधिक 25 हो गई है, जबकि अनुसूचित जाति-जनजाति के अब 11 मंत्री हैं।
सवर्ण समाज की नाराजगी दूर करने की कोशिश
जातीय संतुलन साधने की कड़ी में पार्टी ने सवर्ण समाज की नाराजगी दूर करने का भी प्रयास किया है। यूजीसी और अन्य मुद्दों को लेकर सवर्णों में उपजी संभावित नाराजगी को देखते हुए मनोज पांडेय को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। वर्तमान में सवर्ण समाज से 22 मंत्री हैं, जिनमें ब्राह्मण समाज के आठ, राजपूत के छह, वैश्य के चार, भूमिहार के दो और खत्री व कायस्थ समाज के एक-एक प्रतिनिधि शामिल हैं। पार्टी ने क्षत्रिय और वैश्य समाज की भागीदारी को यथावत रखते हुए सामाजिक समरसता का संदेश देने की कोशिश की है।
पूरब से पश्चिम तक क्षेत्रीय समीकरणों का मेल
यह विस्तार केवल जातीय आधार पर ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखकर भी किया गया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जाट, गुर्जर और लोध बिरादरी को प्रतिनिधित्व देकर भाजपा ने किसान बेल्ट को साधने की कोशिश की है, तो वहीं पूर्वांचल और मध्य यूपी के समीकरणों को भी दुरुस्त किया गया है। मंत्रिमंडल में लोध समाज से कैलाश राजपूत, पाल बिरादरी से अजीत सिंह, विश्वकर्मा समाज से हंसराज, गुर्जर समाज से सोमेंद्र तोमर और जाट बिरादरी से भूपेंद्र चौधरी के जरिए विभिन्न सामाजिक वर्गों तक अपनी पहुंच मजबूत की है।
सहयोगी दलों की स्थिति और आगामी चुनौतियां
योगी मंत्रिमंडल के इस दूसरे विस्तार में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि एनडीए के सहयोगी दलों की हिस्सेदारी में कोई बदलाव नहीं हुआ है। अपना दल (एस), निषाद पार्टी, रालोद और सुभासपा का एक-एक विधायक वर्तमान में मंत्री है। बंगाल और असम जैसे राज्यों में भाजपा की हालिया जीत के बाद सहयोगी दल फिलहाल भाजपा पर दबाव बनाने से बच रहे हैं। भाजपा की इस घेराबंदी के बाद अब आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और बसपा के लिए गैर-यादव ओबीसी और दलित मतों में सेंधमारी करना एक बड़ी चुनौती साबित होगा।


