बंगाल चुनाव में SIR पर महासंग्राम: ममता बनर्जी का सुप्रीम कोर्ट में मोर्चा, क्या बीजेपी का दांव पड़ेगा उल्टा?

Kolkata News: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच ‘विशेष गहन पुनरावृति’ (SIR) का मुद्दा अब कानूनी और राजनीतिक लड़ाई का सबसे बड़ा अखाड़ा बन गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाते हुए खुद सुप्रीम कोर्ट में केस की पैरवी शुरू कर दी है। चुनाव आयोग जहां इसे असली मतदाताओं की पहचान की एक रूटीन प्रक्रिया बता रहा है, वहीं ममता बनर्जी इसे लोकतंत्र पर हमला करार दे रही हैं। बंगाल के पहले चरण की 152 सीटों पर मतदान पूरा हो चुका है, जहां 18 लाख नाम कटने के बावजूद रिकॉर्ड मतदान हुआ है।

वोटर लिस्ट से 18 लाख नाम कटे, फिर भी बढ़ा वोटिंग प्रतिशत

बंगाल चुनाव के पहले चरण की 152 सीटों पर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। SIR की प्रक्रिया के तहत इन क्षेत्रों से करीब 18 लाख वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। इसके बावजूद, इन सीटों पर पिछले चुनाव के मुकाबले 24 लाख अधिक लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है। शानदार वोटिंग टर्नआउट के बाद भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी रैलियों में इस मुद्दे को लगातार हवा दे रही हैं। उनका आरोप है कि यह प्रक्रिया खास समुदायों को निशाना बनाने के लिए अपनाई गई है।

बीजेपी का घुसपैठिया कार्ड बनाम ममता की महिला ब्रिगेड

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को अपनी जीत का आधार मान रही है। गृहमंत्री अमित शाह सहित बीजेपी के शीर्ष नेता दावा कर रहे हैं कि SIR के जरिए घुसपैठिए वोटरों के नाम काट दिए गए हैं, जिससे अब बंगाल के असली नागरिक बिना किसी डर के वोट डाल पा रहे हैं। हालांकि, ममता बनर्जी की करीबी और कैबिनेट मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य का दावा कुछ और ही है। उनका कहना है कि बीजेपी का यह दांव अब उन पर ही उल्टा पड़ गया है क्योंकि इसमें कई हिंदू वोटरों के नाम भी कट गए हैं।

चंद्रिमा भट्टाचार्य का दावा: हैरेसमेंट से बीजेपी के वोटर भी नाराज

वरिष्ठ नेता चंद्रिमा भट्टाचार्य ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग के साथ मिलकर बीजेपी ने जो योजना बनाई थी, वह फेल हो गई है। उनके अनुसार, माइनॉरिटी और महिलाओं को टारगेट करने की कोशिश में बड़ी संख्या में हिंदुओं के नाम भी सूची से बाहर हो गए। चंद्रिमा का मानना है कि इस प्रशासनिक प्रक्रिया की वजह से आम लोगों को जो परेशानी और उत्पीड़न झेलना पड़ा है, उसने बीजेपी के पारंपरिक वोटरों को भी उनके खिलाफ कर दिया है। अब यह मुद्दा ‘सहानुभूति’ की लहर में बदल रहा है।

न्यायपालिका पर भरोसा और ट्रिब्यूनल की सक्रियता

ममता बनर्जी की सरकार को अब न्यायपालिका से बड़ी उम्मीदें हैं। दम दम उत्तर निर्वाचन क्षेत्र में प्रचार के दौरान चंद्रिमा भट्टाचार्य ने कहा कि लोगों ने देखा है कि कैसे उनकी नेता (ममता बनर्जी) इस अन्याय के खिलाफ अदालत तक लड़ी हैं। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब ट्रिब्यूनलों के जरिए नामों को वापस जोड़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल वोटर लिस्ट में नाम न होने से किसी नागरिक का वोट देने का मौलिक अधिकार खत्म नहीं हो जाता है।

चुनाव आयोग की भूमिका पर ममता सरकार का कड़ा प्रहार

ममता बनर्जी और उनके नेता लगातार चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि आयोग ने जानबूझकर चुनाव के ठीक पहले इस प्रक्रिया को अंजाम दिया, जिससे लाखों लोग समय पर अपना नाम वापस नहीं जुड़वा सके। हालांकि, कानूनी लड़ाई और ट्रिब्यूनल की सक्रियता ने ममता सरकार को एक नई उम्मीद दी है। अब देखना यह होगा कि बंगाल की जनता इस ‘वोटर लिस्ट विवाद’ को किस नजरिए से देखती है और इसका चुनावी परिणाम पर क्या असर पड़ता है।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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