AAP में बगावत के बाद दल-बदल कानून पर क्यों टिकी हैं सबकी निगाहें? जानिए स्पीकर से कोर्ट तक का पूरा खेल

New Delhi: आम आदमी पार्टी में बगावत की सुगबुगाहट ने दल-बदल विरोधी कानून को फिर सुर्खियों में ला दिया है। यह कानून सिर्फ राजनीतिक गोटियों का खेल नहीं, बल्कि सरकारों की स्थिरता और सदन के गणित का आधार है। जब चुने हुए प्रतिनिधि पाला बदलते हैं, तो स्पीकर, चुनाव आयोग और अदालतों की भूमिका अचानक सबसे अहम हो जाती है।

दल-बदल विरोधी कानून क्यों बना

यह कानून 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए दसवीं अनुसूची के रूप में जोड़ा गया था। इसका सीधा मकसद था – बार-बार गिरती सरकारों और खरीद-फरोख्त की राजनीति पर लगाम लगाना। इसके तहत अगर कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से पार्टी छोड़ देता है या व्हिप के खिलाफ वोट करता है, तो उसकी सदस्यता तुरंत खतरे में पड़ सकती है। कानून का मूल सिद्धांत यही है कि जनादेश के साथ विश्वासघात न हो।

2003 का संशोधन और विलय की कानूनी ढाल

लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचारी के अनुसार, 2003 में एक अहम संशोधन हुआ। इसके तहत अगर किसी दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद एकजुट होकर किसी दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो इसे दल-बदल नहीं माना जाएगा। यह प्रावधान एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, जो खेमे को एक साथ तोड़कर कानूनी दायरे में रहने की छूट देता है।

स्पीकर के हाथ में अयोग्यता की तलवार

दल-बदल के मामलों में अयोग्यता का फैसला सदन का स्पीकर या चेयरपर्सन ही करता है। शिकायत मिलने पर वही तय करते हैं कि सदस्य ने कानून का उल्लंघन किया या नहीं। लेकिन स्पीकर का निर्णय अंतिम नहीं होता, उसे अदालत में कड़ी चुनौती दी जा सकती है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र राजनीतिक संकट के दौरान स्पीकर को समयबद्ध फैसला लेने का आदेश दिया था, जिससे इस प्रक्रिया की जटिलता और बढ़ गई।

चुनाव आयोग कब करता है दखल

जब मामला सिर्फ अयोग्यता से आगे बढ़कर पार्टी में बड़ी टूट और असली पार्टी के दावे का हो, तब चुनाव आयोग की भूमिका केंद्र में आती है। आयोग यह परखता है कि विधायकों, सांसदों और संगठन में बहुमत के आधार पर किस गुट का दावा ज्यादा मजबूत है। चुनाव चिह्न और पार्टी के नाम पर अंतिम मुहर भी इसी स्तर पर लगती है।

इस्तीफा और अयोग्यता का अंतर समझिए

अगर कोई सदस्य इस्तीफा देता है और वह स्वीकार हो जाता है, तो स्थिति अलग होती है। लेकिन दल-बदल कानून के तहत अयोग्य ठहराए जाने पर वह सदस्य तुरंत मंत्री नहीं बन सकता। उसे पहले दोबारा चुनाव जीतकर आना होता है। इतना ही नहीं, अयोग्य सदस्य विधानसभा या लोकसभा में फ्लोर टेस्ट जैसी अहम प्रक्रिया में हिस्सा भी नहीं ले सकता, जिससे सरकार का गणित पूरी तरह बदल सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्ष ट्रिब्यूनल की मांग

साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने संसद से साफ कहा था कि इस कानून पर पुनर्विचार की जरूरत है। अदालत ने संकेत दिया था कि अयोग्यता का फैसला स्पीकर के बजाय रिटायर्ड जजों वाला कोई स्वतंत्र ट्रिब्यूनल करे, तो यह ज्यादा निष्पक्ष होगा। इसके बाद भी कई राज्यों के संकट के दौरान स्पीकर के कार्यालय पर लगे पक्षपात के आरोप न्यायपालिका तक पहुँचते रहे हैं।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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