राज्यसभा में बड़ा उलटफेर: क्या AAP के 7 सांसदों के साथ आने से BJP अब उच्च सदन में बनेगी ‘अजेय’?

Delhi News: राज्यसभा के भीतर सियासी समीकरण अब पूरी तरह से बदल चुके हैं। आम आदमी पार्टी (AAP) के 10 में से 7 सांसदों द्वारा भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने की खबरों ने विपक्षी खेमे में हलचल तेज कर दी है। इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सदस्य संख्या अब 145 के पार पहुंच गई है। यह बढ़त सरकार के लिए विधायी कामकाज को सुगम बनाने की दिशा में एक बेहद निर्णायक और बड़ा कदम मानी जा रही है।

सदन में BJP की बढ़ती ताकत और नया गणित

सदन के भीतर भाजपा की अपनी व्यक्तिगत शक्ति में भी इस विलय के बाद भारी इजाफा देखने को मिलेगा। यदि राज्यसभा के सभापति इन सात सांसदों के भाजपा में विलय को औपचारिक तौर पर मंजूरी दे देते हैं, तो अकेले भाजपा के सदस्यों की संख्या 106 से बढ़कर 113 हो जाएगी। यह वृद्धि पार्टी को उच्च सदन में पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली स्थिति में ला खड़ा करती है। अब भाजपा महत्वपूर्ण विधेयकों पर क्षेत्रीय दलों के समर्थन की मजबूरी से बाहर निकल सकती है।

साधारण बहुमत के आंकड़े से कितनी दूर है सरकार?

राज्यसभा में किसी भी सामान्य विधेयक को पारित कराने के लिए साधारण बहुमत यानी 123 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, भाजपा अपने सात मनोनीत सांसदों और दो निर्दलीय सदस्यों का समर्थन हासिल कर लेती है, तो यह जादुई आंकड़ा 122 तक पहुंच जाता है। यानी सत्ताधारी पार्टी अब उच्च सदन में अपने दम पर बहुमत साबित करने से केवल एक कदम की दूरी पर खड़ी है। यह स्थिति भविष्य की राजनीतिक और विधायी रणनीतियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

संवैधानिक संशोधनों के लिए दो-तिहाई बहुमत की चुनौती

राजनीति में साधारण बहुमत के साथ-साथ दो-तिहाई बहुमत का भी अपना एक विशेष महत्व होता है। सरकार को बड़े संवैधानिक बदलाव या कड़े कानून लाने के लिए सदन में 163 सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है। हालांकि एनडीए 145 के आंकड़े तक पहुंच गया है, लेकिन वह अभी भी इस लक्ष्य से 18 सांसद पीछे है। लोकसभा में भी गठबंधन के पास फिलहाल दो-तिहाई बहुमत का अभाव है, जिससे कुछ बेहद पेचीदा और बड़े विधायी सुधारों को लागू करने में देरी हो सकती है।

दल-बदल कानून और सभापति के फैसले पर नजर

इस पूरे सियासी विलय की कानूनी शुचिता अब राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है। संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य एक साथ पाला बदलते हैं, तो उनकी सदस्यता पर कोई आंच नहीं आती है। आप सांसद राघव चड्ढा के इस दावे के बाद कि 70 फीसदी सांसद साथ हैं, तकनीकी रूप से यह विलय वैध नजर आता है। अब सभी की निगाहें सभापति कार्यालय से आने वाली आधिकारिक घोषणा पर टिकी हुई हैं।

राजनीतिक स्थिरता और भविष्य की राह

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा में आई यह मजबूती एनडीए सरकार के लिए आने वाले सत्रों में काफी मददगार साबित होगी। अब सरकार को छोटे दलों की ब्लैकमेलिंग या दबाव की राजनीति का सामना नहीं करना पड़ेगा। हालांकि, विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के लिए यह एक बहुत बड़ा झटका है, क्योंकि उसने उच्च सदन में अपनी ताकत खो दी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष इस नई चुनौती से निपटने के लिए क्या रणनीति अपनाता है।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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