National News: ऑनलाइन गेमिंग की चकाचौंध भरी दुनिया के पीछे एक बेहद खतरनाक और जानलेवा तंत्र काम कर रहा है, जिसे मनोवैज्ञानिक ‘किलर एल्गोरिदम’ कह रहे हैं। विशेषज्ञों का दावा है कि ये गेमिंग ऐप्स किशोरों और युवाओं के मस्तिष्क को इस कदर नियंत्रित कर रहे हैं कि वे न केवल वित्तीय जाल में फंस रहे हैं, बल्कि जघन्य अपराधों की ओर भी कदम बढ़ा रहे हैं। एम्स के विशेषज्ञों ने इसे एक ऐसा ‘अदृश्य नशा’ करार दिया है, जो युवाओं की सोचने-समझने की शक्ति को पूरी तरह नष्ट कर रहा है और उन्हें हिंसक व्यवहार के लिए उकसा रहा है।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है ‘गेमिंग डिसऑर्डर’
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के प्रोफेसर डॉ. रविंद्र राव के अनुसार, गेमिंग की लत किसी ड्रग्स के नशे से कम नहीं है। जब किसी लती को गेम खेलने से रोका जाता है, तो वह अपना मानसिक संतुलन खो देता है और कुछ भी कर गुजरने पर आमादा हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी अब ‘गेमिंग डिसऑर्डर’ को एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में मान्यता दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि इहबास जैसे संस्थानों के अध्ययन बताते हैं कि यह डिजिटल जाल सामाजिक सुरक्षा के लिए अब तक का सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है।
किशोरों के मस्तिष्क को निशाना बना रहीं गेमिंग कंपनियां
गेमिंग विशेषज्ञ रचित मल्होत्रा के अनुसार, कंपनियां अरबों रुपये का निवेश केवल यह समझने में करती हैं कि मानव मस्तिष्क को कैसे ‘हैक’ किया जाए। 14 से 22 वर्ष के युवाओं का ‘प्रीफ्रंटल कार्टेक्स’ पूरी तरह विकसित नहीं होता, जिससे वे सही-गलत का निर्णय नहीं ले पाते। डेवलपर्स इसी का फायदा उठाकर ‘रिवॉर्ड प्रेडिक्टिबिलिटी’ तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। इससे खिलाड़ी को यह लालच रहता है कि उसे अगले ही पल कोई बड़ा इनाम मिलेगा, और इसी उम्मीद में वह रोजाना औसतन 5 घंटे गेम से चिपका रहता है।
मुफ्त खेल से शुरू होकर डिजिटल जुए तक का सफर
शुरुआत में ये गेम पूरी तरह मुफ्त लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे खिलाड़ी को ‘पावर-अप्स’, ‘हथियार’ और ‘स्किन्स’ खरीदने के लिए उकसाया जाता है। इसके बाद ‘लूट बॉक्स’ जैसे फीचर जोड़े जाते हैं, जो असल में डिजिटल जुआ हैं। यह सट्टेबाजी की मानसिकता विकसित करता है, जिससे युवा कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। जब घर से पैसे मिलना बंद हो जाते हैं, तो ये युवा चोरी, ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर अपराधों का रास्ता चुनते हैं। साइबर सेल के आंकड़े बताते हैं कि 40 प्रतिशत किशोर अपराधों का सीधा संबंध गेमिंग के लिए पैसे जुटाने से है।
गेमर से अपराधी बनने की खतरनाक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया
डॉ. निमिष जी देसाई का कहना है कि किसी खिलाड़ी का अपराधी बनना अचानक नहीं होता। लगातार हिंसक गेम खेलने से खिलाड़ी का वास्तविकता से नाता टूट जाता है। उसे लगने लगता है कि असली दुनिया में भी गेम की तरह ‘रीसेट’ बटन होता है। वह खून और हिंसा के प्रति संवेदनहीन हो जाता है। जब शरीर में डोपामाइन की कमी होती है, तो एडिक्ट व्यक्ति हिंसक हो जाता है। ऐसे में वह अपने माता-पिता तक को ‘दुश्मन’ समझने लगता है और उन पर जानलेवा हमला करने से भी पीछे नहीं हटता।
