Karnataka News: कर्नाटक की सिद्धरमैया सरकार ने अनुसूचित जातियों (SC) के लिए आंतरिक आरक्षण के एक ऐतिहासिक और संशोधित फॉर्मूले को अपनी हरी झंडी दे दी है। शुक्रवार को हुई कैबिनेट की अहम बैठक में कुल 15 प्रतिशत एससी आरक्षण के भीतर वर्गीकरण को मंजूरी दी गई। इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ उन युवाओं को मिलेगा जो सरकारी नौकरियों का इंतजार कर रहे थे। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि इस निर्णय के साथ ही राज्य में लंबे समय से रुकी हुई भर्ती प्रक्रिया अब तेजी से शुरू हो सकेगी।
क्या है आरक्षण का नया गणित और वर्गीकरण?
मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने कैबिनेट बैठक के बाद विस्तार से बताया कि आरक्षण को तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है। सरकार ने ‘वामपंथी’ और ‘दक्षिणपंथी’ समुदायों के लिए समान रूप से 5.25-5.25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया है। इसके अलावा, खानाबदोश समुदायों सहित अन्य अनुसूचित जातियों के लिए लगभग 4.5 प्रतिशत कोटा निर्धारित किया गया है। सरकार का दावा है कि यह वर्गीकरण पूरी तरह से वैज्ञानिक और आनुपातिक है, ताकि सभी वंचित वर्गों को न्याय मिल सके।
भर्ती प्रक्रिया पर लगा ब्रेक अब हटेगा
राज्य सरकार के इस कदम से सरकारी नौकरियों के क्षेत्र में नई हलचल शुरू होने वाली है। मुख्यमंत्री ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि कल से ही नई अधिसूचना जारी कर दी जाएगी। सरकार का इरादा आंतरिक आरक्षण के नए नियमों के तहत तत्काल प्रभाव से रिक्त पदों को भरने का है। पिछले काफी समय से इस नीतिगत स्पष्टता के अभाव में नियुक्तियां अटकी हुई थीं, जिससे हजारों उम्मीदवारों में भारी रोष था, लेकिन अब रास्ता पूरी तरह साफ है।
आरक्षण की सीमा और अदालती पेच
सिद्धरमैया ने स्पष्ट किया कि सरकार पहले अनुसूचित जातियों के लिए 17 प्रतिशत आरक्षण चाहती थी, लेकिन कानूनी बाधाओं के कारण इसे 15 प्रतिशत पर सीमित करना पड़ा। उन्होंने प्रसिद्ध इंदिरा साहनी मामले का हवाला देते हुए बताया कि आरक्षण की कुल सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले के अनुसार, संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहते हुए ही आंतरिक आरक्षण लागू किया गया है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि भविष्य में इस फैसले को कोई कानूनी चुनौती न मिले।
कैबिनेट में दिखी एकजुटता और सहमति
इस महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले पर सरकार के भीतर किसी भी तरह के मतभेद की खबरों को मुख्यमंत्री ने सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि पूरा मंत्रिमंडल इस वर्गीकरण पर एकमत था। बैठक में केएच मुनियप्पा, डॉ. जी परमेश्वर और प्रियांक खर्गे जैसे दिग्गज दलित नेताओं की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि सरकार सामाजिक न्याय के मुद्दे पर पूरी तरह एकजुट है। इस फैसले को कर्नाटक की राजनीति में एक बड़े सामाजिक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।
