Manipur News: मिडिल ईस्ट में जारी भीषण तनाव और युद्ध के बीच भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से एक हैरान करने वाली खबर सामने आई है। मणिपुर और मिजोरम के ‘बनेई मेनाशे’ समुदाय के 249 सदस्य इस वक्त सुरक्षित तरीके से इजरायल की धरती पर पहुंच चुके हैं। खुद को इजरायल की ’10 खोई हुई जनजातियों’ का वंशज मानने वाला यह समूह उस समय इजरायल पहुंचा है, जब वहां लेबनान और ईरान के साथ संघर्ष की स्थितियां बेहद गंभीर बनी हुई हैं।
मेनाशे जनजाति के वंशज होने का अटूट विश्वास
मणिपुर और मिजोरम के कुकी व मिजो आदिवासी समुदायों के बीच रहने वाला यह यहूदी समूह सदियों से एक विशेष धार्मिक आस्था का पालन कर रहा है। बनेई मेनाशे समुदाय के लोगों का यह दृढ़ विश्वास है कि वे बाइबिल काल की मेनाशे जनजाति के असली उत्तराधिकारी हैं। वर्तमान में लगभग 7,000 सदस्य भारत के इन दोनों राज्यों में निवास करते हैं। अपनी जड़ों की तलाश में इस समुदाय के हजारों लोग पिछले कई वर्षों के दौरान पहले ही इजरायल जाकर बस चुके हैं।
विशेष सरकारी ऑपरेशन और माइग्रेशन का बड़ा लक्ष्य
इजरायली कैबिनेट ने पिछले नवंबर में इस समुदाय को वापस बुलाने के लिए एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना को मंजूरी दी थी। इस विशेष ऑपरेशन के तहत सरकार ने इन प्रवासियों की हवाई यात्रा, हिब्रू भाषा की शिक्षा, रहने की व्यवस्था और धर्म परिवर्तन की कक्षाओं के लिए एक बड़ा बजट आवंटित किया है। इजरायल सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 के अंत तक समुदाय के सभी सदस्यों को वहां ले जाकर बसाना है। यह अभियान रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कानूनी चुनौतियां और यहूदी पहचान का संघर्ष
बनेई मेनाशे समुदाय के लिए इजरायल की नागरिकता हासिल करना कानूनी तौर पर कभी आसान नहीं रहा है। दरअसल, इजरायली कानून के तहत शुरुआत में इन्हें यहूदी नहीं माना जाता था, जिसके कारण इनके रिलोकेशन के लिए विशेष सरकारी आदेश की आवश्यकता पड़ी। ‘शावेई इजरायल’ जैसी संस्थाओं ने अब तक लगभग 4,000 सदस्यों को इजरायल भेजने में मदद की है। 2006 और 2018 के बीच भी बड़े स्तर पर मिजोरम और मणिपुर से परिवारों ने अपनी जमीन छोड़ी थी।
उत्तरी इजरायल के शहरों में मिलेगी नई पहचान
इजरायल पहुंचने वाले इन नए प्रवासियों को मुख्य रूप से उत्तरी इजरायल के नोफ हागालिल और किरयात याम जैसे सुरक्षित क्षेत्रों में बसाने की तैयारी की गई है। ‘डेगेल मेनाशे’ संगठन के अनुसार, 249 लोगों का यह जत्था तो महज एक शुरुआत है। आने वाले कुछ ही हफ्तों में दो और विमानों के जरिए लगभग 600 और लोग वहां पहुंचने वाले हैं। साल के अंत तक कुल प्रवासियों की संख्या में काफी इजाफा होने की उम्मीद जताई जा रही है।
युद्ध के साये में ‘घर वापसी’ की बड़ी चुनौती
एक तरफ जहां होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका और ईरान की पैनी नजरें हैं, वहीं दूसरी तरफ इजरायल-लेबनान सीमा पर जंग जारी है। ऐसी खतरनाक परिस्थितियों में भी बनेई मेनाशे समुदाय के लोगों का इजरायल की ओर पलायन करना उनकी अपनी संस्कृति के प्रति गहरी निष्ठा को दर्शाता है। विश्लेषकों का मानना है कि 2030 तक चलने वाला यह निरंतर ऑपरेशन न केवल मानवीय बल्कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी वैश्विक राजनीति में चर्चा का विषय बना रहेगा।
