Greater Noida News: उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्र गौतमबुद्ध नगर में रहने वाले हजारों श्रमिकों के लिए नया महीना नई चिंताएं लेकर आ रहा है। 1 मई से 10 मई के बीच जब श्रमिकों के हाथ में नया बढ़ा हुआ वेतन आएगा, तब उनकी जेब पहले के मुकाबले और हल्की रहने वाली है। इसका मुख्य कारण काम के घंटों का सख्ती से पालन और ओवर टाइम (OT) में की गई भारी कटौती है। पहले जो श्रमिक ओवर टाइम के जरिए 2,000 से 5,000 रुपये अतिरिक्त कमा लेते थे, अब उनकी वह आय शून्य हो गई है, जिससे घरेलू बजट पूरी तरह चरमरा गया है।
बढ़ते खर्च और सीमित आय के बीच पिसता परिवार
नोएडा के हरौला गांव में रहने वाले श्रमिक इंतियाज की कहानी उन हजारों कामगारों की प्रतिनिधि है जो महानगर की महंगाई से जूझ रहे हैं। इंतियाज को प्रतिमाह 20 हजार रुपये वेतन मिलता है, लेकिन नोएडा से ग्रेटर नोएडा आने-जाने, कमरे के किराए और राशन में ही इसका 90 प्रतिशत हिस्सा खत्म हो जाता है। उनके पास बच्चों की स्कूल फीस भरने के लिए भी पैसे नहीं बचते। स्थिति इतनी विकट है कि उन्हें हर महीने अपने सहकर्मियों से कर्ज लेकर बच्चों की पढ़ाई जारी रखनी पड़ रही है।
न्यूनतम वेतन में वृद्धि बनी ऊंट के मुंह में जीरा
सूरजपुर कस्बे में रहने वाली गुलिस्ता और इकोटेक-3 में काम करने वाली रूबीना जैसे कई श्रमिकों का वेतन हाल ही में बढ़ा है। गुलिस्ता का वेतन 10 हजार से बढ़कर 13 हजार रुपये हुआ है, लेकिन पांच लोगों के परिवार का खर्च अब भी 25 हजार रुपये के आसपास बैठता है। रूबीना बताती हैं कि ओवर टाइम न मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति और खराब हो गई है। उनके अनुसार, सरकार ने श्रमिकों के विरोध के बाद वेतन तो बढ़ाया, लेकिन आसमान छूती महंगाई के सामने यह वृद्धि नाकाफी साबित हो रही है।
मदद के भरोसे चल रहा है मध्यमवर्गीय श्रमिकों का घर
फैक्ट्री कर्मचारी प्रियांशी का कहना है कि उनकी 12 हजार रुपये की मासिक आय से घर चलाना असंभव है। उन्हें हर महीने अपने भाई से आर्थिक मदद लेनी पड़ती है। श्रमिकों का मानना है कि केवल वेतन बढ़ाना समाधान नहीं है, बल्कि महंगाई पर लगाम लगाना और ओवर टाइम की सुविधा को सुचारू रखना भी जरूरी है। औद्योगिक क्षेत्रों में काम के घंटे तय होने से उत्पादन तो व्यवस्थित हुआ है, लेकिन उन मजदूरों की अतिरिक्त आय छीन गई है जो रात-दिन मेहनत कर अपने परिवार का भविष्य संवारना चाहते थे।
महंगाई के मुकाबले नाकाफी है सरकारी कदम
श्रमिक संगठनों का तर्क है कि गौतमबुद्ध नगर जैसे महंगे जिले में रहने का खर्च अन्य शहरों की तुलना में कहीं अधिक है। यहां मकान किराया और परिवहन खर्च ही वेतन का बड़ा हिस्सा डकार जाते हैं। श्रमिकों ने मांग की है कि सरकार को न्यूनतम वेतनमान तय करते समय स्थानीय महंगाई दर और जीवन स्तर को ध्यान में रखना चाहिए। वर्तमान स्थिति में, बढ़ा हुआ वेतनमान भी श्रमिकों को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालने में विफल साबित हो रहा है, जिससे औद्योगिक क्षेत्रों में असंतोष बढ़ रहा है।
