Uttar Pradesh News: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अजीबोगरीब मामले में तेल कंपनी और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने उस प्रक्रिया पर हैरानी जताई है, जिसके तहत वर्ष 1996 में मर चुके एक व्यक्ति को साल 2005 में अतिक्रमण का नोटिस जारी किया गया। न्यायमूर्ति की पीठ ने इस मामले में प्रथम दृष्टया लापरवाही मानते हुए तेल कंपनी को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि कंपनी को यह ‘दिव्य ज्ञान’ कैसे प्राप्त हुआ कि एक मृत व्यक्ति पाइपलाइन पर अतिक्रमण कर रहा है।
अदालत ने लगाया यथास्थिति का आदेश
यह पूरा विवाद रिट याचिका संख्या 13635/2026 से संबंधित है, जिसकी सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विवादित स्थल पर ‘यथास्थिति’ (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता महेंद्र कुमार ने 16 अगस्त और 15 अक्टूबर 2005 को जारी किए गए नोटिसों को चुनौती दी थी। अदालत ने माना कि नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में बुनियादी खामियां नजर आ रही हैं, जिसके कारण अगली सुनवाई तक किसी भी प्रकार की कार्रवाई पर रोक लगा दी गई है।
प्रशासनिक लापरवाही: मृत पिता के नाम जारी हुए नोटिस
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष दलील दी कि संबंधित अधिकारियों ने बिना किसी जमीनी सत्यापन के कागजी नोटिस जारी कर दिए। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि ये नोटिस महेंद्र कुमार के पिता के नाम पर भेजे गए, जिनका निधन 11 अक्टूबर 1996 को ही हो चुका था। याचिकाकर्ता का तर्क है कि जो व्यक्ति लगभग नौ साल पहले दुनिया छोड़ चुका है, उस पर अतिक्रमण का आरोप लगाना न केवल हास्यास्पद है, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की घोर लापरवाही को भी उजागर करता है।
12 मई को होगी अगली सुनवाई, कंपनी को देना होगा जवाब
सुनवाई के दौरान जब केंद्र सरकार और तेल कंपनी ने कहा कि पाइपलाइन के ऊपर अवैध निर्माण की सूचना पर नोटिस भेजे गए, तो अदालत ने जांच की गहराई पर सवाल किए। न्यायालय ने कंपनी को आदेश दिया है कि वह शपथपत्र के जरिए स्पष्ट करे कि उनके सत्यापन की प्रक्रिया क्या है और मृत व्यक्ति का नाम उनके रिकॉर्ड में कैसे आया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 12 मई 2026 को तय की गई है, जिसमें तेल कंपनी को अपनी पूरी जांच प्रक्रिया का ब्योरा पेश करना होगा।
