Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश में नए बिजली कनेक्शनों को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार द्वारा स्मार्ट प्रीपेड मीटर की अनिवार्यता खत्म किए जाने के बावजूद, प्रदेश में आज भी नए कनेक्शन केवल प्रीपेड मोड में ही दिए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने इसे उपभोक्ताओं के अधिकारों का सीधा उल्लंघन और उनके साथ ‘बड़ा धोखा’ करार दिया है। परिषद का दावा है कि पावर कॉरपोरेशन जानबूझकर पुरानी अधिसूचनाओं का सहारा लेकर जनता को गुमराह कर रहा है।
कानूनी संशोधन के बाद भी पुरानी व्यवस्था लागू
उपभोक्ता परिषद के अनुसार, पावर कॉरपोरेशन ने 10 सितंबर 2023 से नए कनेक्शनों पर स्मार्ट प्रीपेड मीटर अनिवार्य किया था। उस समय इसका आधार केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) की फरवरी 2022 की अधिसूचना को बनाया गया था। हालांकि, एक लंबे कानूनी संघर्ष के बाद केंद्र ने नियमों में संशोधन किया। इस नए संशोधन के तहत 1 अप्रैल 2026 से प्रीपेड मोड की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया है। इसके बावजूद, उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग अभी भी पुराने नियमों के तहत ही उपभोक्ताओं पर प्रीपेड मीटर थोप रहा है।
ऊर्जा मंत्री की चुप्पी और सीबीआई जांच की मांग
उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने इस पूरे मामले में सरकार और विभाग की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जब केंद्र ने नियम बदल दिए हैं, तो पावर कॉरपोरेशन इसे लागू करने में देरी क्यों कर रहा है? वर्मा ने ऊर्जा मंत्री की चुप्पी पर भी कटाक्ष किया और मांग की है कि इस पूरे ‘प्रीपेड मीटर घोटाले’ की सीबीआई (CBI) जांच होनी चाहिए। परिषद का मानना है कि इसके पीछे किसी बड़ी लॉबी का हाथ हो सकता है जो उपभोक्ताओं को जबरन प्रीपेड मोड में धकेलना चाहती है।
उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रीपेड मीटर की अनिवार्यता खत्म होने का मतलब है कि अब यह उपभोक्ता की इच्छा पर निर्भर होना चाहिए कि वह पोस्टपेड कनेक्शन चाहता है या प्रीपेड। लेकिन यूपी में विकल्प न देना सीधे तौर पर उपभोक्ता संरक्षण नियमों के खिलाफ है। परिषद ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही पावर कॉरपोरेशन ने अपनी कार्यप्रणाली नहीं सुधारी और नए आदेश को लागू नहीं किया, तो वे इस मामले को लेकर नियामक आयोग और अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे।
