Uttar Pradesh News: मेरठ से प्रयागराज तक बन रहा गंगा एक्सप्रेसवे जल्द ही शुरू होने वाला है। इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों का इलाहाबाद हाई कोर्ट तक पहुंचना आसान हो जाएगा। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों और अधिवक्ताओं का मानना है कि केवल एक्सप्रेसवे से न्याय सुलभ नहीं होगा। एक्सप्रेसवे से समय की बचत तो होगी, लेकिन गरीब तबके के लिए यह सफर काफी महंगा साबित होगा। वरिष्ठ वकीलों ने एक बार फिर पश्चिम यूपी में हाई कोर्ट बेंच की मांग तेज कर दी है।
सफर होगा तेज पर टोल टैक्स बढ़ाएगा मुश्किलें
मेरठ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष रोहिताश्व कुमार अग्रवाल के मुताबिक एक्सप्रेसवे यात्रा के समय को आधा कर देगा। जो सफर पहले 14 घंटे में पूरा होता था, वह अब मात्र 6 से 7 घंटे में सिमट जाएगा। लेकिन अनिल कुमार बक्शी जैसे जानकारों का कहना है कि यह सुविधा मुफ्त नहीं होगी। एक्सप्रेसवे पर लगने वाला भारी-भरकम टोल टैक्स आम आदमी की जेब पर भारी पड़ेगा। निजी वाहनों से प्रयागराज जाना हर किसी के बजट में नहीं होगा।
शहरों से दूरी और व्यापार पर असर की चिंता
यह एक्सप्रेसवे मुख्य आबादी और शहरों से काफी दूर हटकर बनाया जा रहा है। अधिवक्ता गजेंद्र सिंह धामा ने बताया कि शहरों से दूरी के कारण स्थानीय व्यापार पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। हालांकि, यह सड़क मार्ग उद्योग, पर्यटन और कृषि क्षेत्रों को पूर्वी उत्तर प्रदेश से सीधे जोड़ेगा। लेकिन वादकारियों के लिए यह केवल समय बचाने का एक माध्यम है। प्रयागराज हाई कोर्ट में मुकदमों का अत्यधिक दबाव अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
हाई कोर्ट बेंच के बिना अधूरा है सुलभ न्याय
मेरठ के वरिष्ठ अधिवक्ताओं का तर्क है कि न्याय को जनता के द्वार तक पहुंचाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। अधिवक्ता संजय शर्मा ने स्पष्ट किया कि गंगा एक्सप्रेसवे इस लक्ष्य को पूरा नहीं करता है। पश्चिम उत्तर प्रदेश के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को जमानत और छोटे मामलों के लिए भी प्रयागराज जाना पड़ता है। इस लंबी यात्रा में उनका काफी समय और पैसा बर्बाद होता है। जब तक स्थानीय बेंच नहीं बनती, तब तक सस्ता न्याय केवल सपना रहेगा।
एक्सप्रेसवे बनाम स्थानीय न्याय की मांग
गंगा एक्सप्रेसवे निश्चित रूप से उत्तर प्रदेश के बुनियादी ढांचे के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। लेकिन कानूनी समुदाय इसे हाई कोर्ट बेंच का विकल्प नहीं मानता है। वकीलों का कहना है कि सरकार को इस क्षेत्र की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति को समझना चाहिए। केवल सड़क बना देने से उन गरीब परिवारों को राहत नहीं मिलेगी जो कानूनी लड़ाई के खर्च से दबे हुए हैं। अब देखना यह है कि एक्सप्रेसवे की रफ्तार के बीच बेंच की मांग क्या मोड़ लेती है।
