Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी नौकरियों में राजनीतिक दखलंदाजी पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। मंडी जिले की पधर तहसील में एक आशा वर्कर की नियुक्ति रद्द कर दी गई है। अदालत ने इसे पूरी तरह से अवैध और मनमाना करार दिया है। सबसे बड़ा झटका यह है कि महिला को अब तक मिली पूरी सैलरी सरकारी खजाने में वापस लौटानी होगी। यह फैसला भाई-भतीजावाद के खिलाफ एक बड़ी नजीर बन गया है।
मंत्री के दबाव में छीना गया योग्य उम्मीदवार का हक
अदालत की सुनवाई में कई बड़े और चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। तत्कालीन स्वास्थ्य और कानून मंत्री के कार्यालय से एक सिफारिशी नोट जारी हुआ था। इस नोट में चयनित उम्मीदवार को नौकरी देने का दबाव बनाया गया था। इसके बाद अधिकारियों ने सारे नियम ताक पर रख दिए। मेरिट में सबसे आगे चल रही योग्य उम्मीदवार को जानबूझकर पीछे कर दिया गया। मंत्री को खुश करने के लिए यह पूरा फर्जीवाड़ा अंजाम दिया गया।
इंटरव्यू में रची गई थी नंबरों की यह बड़ी साजिश
हाईकोर्ट ने चयन प्रक्रिया के पूरे रिकॉर्ड की बहुत गहराई से जांच की है। इस जांच में सामने आया कि असली हकदार के पास दो अंकों की शानदार बढ़त थी। इस बढ़त को खत्म करने के लिए इंटरव्यू कमेटी ने एक बड़ी साजिश रची। बीएमओ और बीडीओ जैसे जिम्मेदार अधिकारियों ने मंत्री की सिफारिश वाली महिला को बहुत ज्यादा नंबर दे दिए। वहीं सबसे योग्य उम्मीदवार को जानबूझकर बेहद कम नंबर दिए गए।
अब मेरिट के आधार पर असली हकदार को मिलेगी नौकरी
न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने इस मनमानी पर अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सार्वजनिक नियुक्तियों में सिर्फ मेरिट ही एकमात्र पैमाना होना चाहिए। मंत्री की इच्छा को कानून नहीं माना जा सकता है। अदालत ने प्रतिवादी अधिकारियों को अब सख्त आदेश जारी किए हैं। उन्हें तुरंत मेरिट सूची में आगे चल रही याचिकाकर्ता को नियुक्ति पत्र देना होगा। इससे न्याय व्यवस्था में लोगों का भरोसा बढ़ा है।
