Delhi News: दिल्ली सरकार की मेधावी छात्रों के लिए शुरू की गई ‘जय भीम मुख्यमंत्री प्रतिभा विकास योजना’ में 38 करोड़ रुपये के बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। इस भ्रष्टाचार के मामले में दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (ACB) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए दिल्ली के नामी कोचिंग संस्थानों के निदेशकों सहित 9 लोगों को गिरफ्तार किया है। करोड़ों की हेराफेरी के कारण गरीब छात्रों को मुफ्त कोचिंग देने वाली इस योजना पर ताला लग गया है। गिरफ्तार सभी आरोपियों को तिहाड़ जेल भेज दिया गया है।
बड़े संस्थानों के निदेशकों पर कसा शिकंजा
एसीबी द्वारा की गई इस कार्रवाई में मुखर्जी नगर और रोहिणी जैसे शिक्षा केंद्रों के प्रतिष्ठित संस्थानों के नाम सामने आए हैं। गिरफ्तार किए गए लोगों में रवींद्र इंस्टीट्यूट के निदेशक रवींद्र कुमार, तक्षशिला इंस्टीट्यूट के नरेंद्र कुमार गुप्ता, किरण इंस्टीट्यूट के शंभू शरण और परिणाम इंस्टीट्यूट के दिग्विजय कुमार शामिल हैं। इन बड़े संस्थानों की दिल्ली में कई शाखाएं संचालित होती हैं। जांच में सामने आया कि इन्होंने सरकार को करोड़ों रुपये के फर्जी बिल थमाकर जनता की गाढ़ी कमाई का गबन किया है।
फर्जी कागजात और आय प्रमाण पत्र का खेल
घोटाले की परतें तब खुलीं जब उपराज्यपाल वीके सक्सेना के निर्देश पर एसीबी ने जांच शुरू की। जांच में पाया गया कि कई संस्थानों ने छात्रों के फर्जी आय प्रमाण पत्र बनवाए और उन पर एसडीएम की फर्जी मुहर लगाकर सरकार से भुगतान का दावा किया। चौंकाने वाली बात यह है कि कई ऐसे छात्रों के नाम भी सूची में मिले जिन्होंने कभी वहां कोचिंग ली ही नहीं थी। संस्थानों ने एक ही छात्र के नाम पर कई बार पैसे ऐंठने का फर्जी दावा पेश किया था।
एनजीओ और ट्यूशन सेंटरों की मिलीभगत
इस घोटाले का जाल केवल बड़े संस्थानों तक ही सीमित नहीं था। सरकार ने रोहिणी स्थित ‘पहल’ नामक जिस एनजीओ को योजना के प्रबंधन का काम सौंपा था, उसके निदेशक जितेंद्र कुमार को भी गिरफ्तार किया गया है। इस एनजीओ ने अधिक लाभ कमाने के चक्कर में अवैध तरीके से छोटे ट्यूशन सेंटरों को भी इस योजना का काम बांट दिया था। इसमें करावल नगर, यमुना विहार और कर्दमपुरी के ट्यूशन सेंटर मालिकों की भी गिरफ्तारी हुई है, जिन्होंने फर्जी छात्रों की फौज खड़ी कर दी थी।
योजना का उद्देश्य और भ्रष्टाचार की मार
बता दें कि इस योजना की शुरुआत दिसंबर 2017 में अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के लिए की गई थी, जिसे बाद में ओबीसी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए भी बढ़ा दिया गया था। योजना के तहत यूपीएससी, जेईई और नीट जैसी परीक्षाओं के लिए सरकार 100 प्रतिशत तक फीस भरती थी और छात्रों को 2,500 रुपये प्रतिमाह वजीफा भी देती थी। लेकिन संचालकों की लालच ने हजारों मेधावी छात्रों के भविष्य को संकट में डाल दिया है, जिससे अब यह योजना बंद हो गई है।
आगामी जांच में और गिरफ्तारियों की आशंका
एसीबी सूत्रों के मुताबिक, अभी जांच का दायरा केवल चार संस्थानों तक ही सीमित है, जबकि इस योजना के तहत कुल 46 बड़े संस्थानों के साथ सरकार का अनुबंध था। 38 करोड़ रुपये के बिलों के भुगतान की मांग के बाद जब एलजी ने जांच बैठाई, तो शुरुआती स्तर पर ही इतने बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ। आशंका जताई जा रही है कि जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, कई अन्य बड़े संस्थानों के संचालकों और शिक्षा विभाग के अधिकारियों की गिरफ्तारी भी संभव है।


