Delhi News: राष्ट्रीय राजधानी में नकली दवाओं का काला कारोबार अब खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। जीवन रक्षक (Life-saving) और महंगी दवाओं के नाम पर मरीजों को मौत परोसी जा रही है। जांच एजेंसियों के खुलासे के अनुसार, कैंसर और डायबिटीज जैसी बीमारियों की दवाओं में असली तत्वों (API) की जगह सलाइन वाटर, डिस्टिल्ड वाटर और स्टार्च का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह केवल मिलावट का मामला नहीं है, बल्कि पूरी तरह से नकली दवाओं का एक संगठित जाल है जो मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहा है।
मरीजों के विश्वास और सेहत के साथ बड़ा धोखा
दवाओं की गुणवत्ता की जांच कर रही एजेंसियों का कहना है कि इन नकली दवाओं का बाहरी आवरण बिल्कुल असली जैसा दिखता है। मरीज और उनके परिजन ऊंचे दामों पर इन्हें खरीदते हैं, लेकिन अंदर की सामग्री या तो पूरी तरह बेअसर होती है या फिर स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक। मुनाफे की लालच में चल रहा यह नेटवर्क अब केवल एक आर्थिक अपराध नहीं रह गया है, बल्कि उपचार के नाम पर मरीजों के साथ किया जा रहा एक बड़ा आपराधिक षड्यंत्र बन गया है।
सीडीएससीओ की रिपोर्ट में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की फरवरी 2026 की ड्रग अलर्ट रिपोर्ट ने स्वास्थ्य जगत में हड़कंप मचा दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में किए गए गुणवत्ता परीक्षणों में 194 दवाएं फेल (NSQ) पाई गई हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें पैरासिटामोल और पेंटाप्राजोल जैसी रोजमर्रा की सामान्य दवाएं भी शामिल हैं। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि बाजार में बिक रही दवाओं की विश्वसनीयता पर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
संसद में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच 3,104 दवा सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे। दिसंबर 2025 में अकेले 167 सैंपल फेल पाए गए, जो इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर जैसे संवेदनशील मामलों में नकली दवा से उपचार बेअसर हो जाता है, वहीं डायबिटीज के मरीजों में इंसुलिन के नाम पर स्टार्च देने से ब्लड शुगर लेवल अनियंत्रित होकर जानलेवा साबित हो सकता है।
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का बढ़ रहा है गंभीर खतरा
नकली दवाओं का एक बड़ा दुष्प्रभाव संक्रमण के प्रति शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होना भी है। एंटीबायोटिक्स के मामले में जब मरीज को नकली दवा दी जाती है, तो संक्रमण खत्म होने के बजाय और अधिक फैल जाता है। इससे शरीर में ‘एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस’ की समस्या पैदा हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, भारत जैसे विकासशील देशों में लगभग 10 प्रतिशत दवाएं सबस्टैंडर्ड या नकली पाई जाती हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक वैश्विक आपातकाल जैसा है।


