Uttar Pradesh News: प्रयागराज के एक वैज्ञानिक ने ऑटोमोबाइल सेक्टर में तहलका मचाने वाला दावा किया है। साइंस ग्रेजुएट शैलेंद्र कुमार सिंह गौर ने 18 साल की कड़ी रिसर्च के बाद एक ‘सिक्स स्ट्रोक इंजन’ विकसित किया है। उनका दावा है कि यह इंजन एक लीटर पेट्रोल में 176 किलोमीटर का माइलेज देता है। यह तकनीक न केवल ईंधन बचाती है, बल्कि प्रदूषण को भी लगभग शून्य कर देती है। शैलेंद्र ने इस क्रांतिकारी तकनीक को पुरानी बाइक को मॉडिफाई करके तैयार किया है।
सिक्स स्ट्रोक इंजन: तकनीक जो बदल देगी भविष्य
शैलेंद्र कुमार सिंह गौर के मुताबिक, यह सिक्स स्ट्रोक इंजन मौजूदा फोर स्ट्रोक तकनीक से कहीं अधिक उन्नत है। इस इंजन की सबसे बड़ी खूबी इसकी बहुमुखी प्रतिभा है। यह पेट्रोल, डीजल, सीएनजी और एथनॉल जैसे किसी भी ईंधन से चल सकता है। इंजन की क्षमता मौजूदा इंजन के मुकाबले तीन गुना अधिक है। साइलेंसर का तापमान बहुत कम रहता है और जहरीली कार्बन मोनोऑक्साइड का उत्सर्जन लगभग शून्य होता है। यह पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल आविष्कार है।
आविष्कार की वेदी पर कुर्बान कर दिया अपना घर
इस जादुई इंजन को हकीकत में बदलने के लिए शैलेंद्र ने भारी कीमत चुकाई है। उन्होंने अपने जीवन के 18 कीमती साल और अपनी पूरी जमा-पूंजी इस शोध में लगा दी। रिसर्च का खर्च उठाने के लिए उन्हें अपना पैतृक मकान तक बेचना पड़ा। आज वह झूंसी में एक किराए के मकान में अपने परिवार के साथ रहते हैं। संसाधनों की कमी के कारण उनके बच्चों की पढ़ाई भी बाधित हुई। उनके बड़े बेटे और बेटी को मजबूरी में अपनी शिक्षा बीच में ही छोड़नी पड़ी।
पीएम मोदी से मदद की गुहार और भविष्य की योजना
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीएससी करने वाले शैलेंद्र ने एमएनएनआईटी और आईआईटी-बीएचयू की प्रयोगशालाओं में भी प्रशिक्षण लिया है। उन्होंने अपने इस अनोखे आविष्कार को पहले ही पेटेंट करा लिया है। अब उन्हें इंतजार है कि कोई बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी इस तकनीक को अपनाए। शैलेंद्र ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी अपील की है कि उनके इस इंजन का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया जाए। इससे देश में ईंधन की बड़ी बचत होगी और उच्च क्षमता वाली गाड़ियां सस्ती मिलेंगी।
कठिन सफर में परिवार बना सबसे बड़ी ताकत
इतनी परेशानियों के बावजूद शैलेंद्र का हौसला नहीं डगमगाया। उनके इस संघर्षपूर्ण सफर में उनकी पत्नी और बच्चों ने पूरा साथ दिया। शैलेंद्र बताते हैं कि कुछ दोस्तों ने भी आर्थिक रूप से उनकी मदद की। 1983 में डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने टाटा मोटर्स की नौकरी तक छोड़ दी थी ताकि वे अपने सपने पर काम कर सकें। आज उनका यह ‘सिक्स स्ट्रोक इंजन’ तैयार है, जिसे वे देश की प्रगति और पर्यावरण की रक्षा के लिए समर्पित करना चाहते हैं।

