हिमाचल पंचायत चुनाव में बड़ा नियम लागू: सास-ससुर के सरकारी जमीन पर कब्जा होने पर बहू नहीं लड़ सकेगी चुनाव

Himachal News: हिमाचल प्रदेश में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे को लेकर राज्य सरकार ने बेहद सख्त कदम उठाया है। अब अगर किसी महिला के सास-ससुर ने सरकारी भूमि पर अतिक्रमण किया है, तो वह पंचायत चुनाव नहीं लड़ पाएगी। बुधवार देर शाम राज्यपाल ने पंचायतीराज अधिनियम में अहम संशोधन को अपनी अंतिम मंजूरी दे दी है। यह नया कड़ा नियम पंचायत चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू होने से ठीक एक दिन पहले लागू कर दिया गया है।

महिला प्रत्याशियों की तैयारियों पर फिरा पानी

अधिनियम की धारा 122 में हुए इस अचानक संशोधन से प्रदेश की कई महिला प्रत्याशियों को भारी झटका लगा है। कई महिलाएं चुनाव मैदान में उतरने के लिए अपनी पूरी तैयारी कर चुकी थीं। उन्होंने सभी आवश्यक औपचारिकताएं और जरूरी दस्तावेज भी पूरे कर लिए थे। लेकिन नई सरकारी अधिसूचना जारी होने के बाद उनके चुनाव लड़ने के सपनों पर पूरी तरह से पानी फिर गया है। अब वे कानूनी तौर पर चुनावी मैदान से पूरी तरह बाहर हो गई हैं।

पंचायती राज एक्ट 1994 में हुआ बड़ा बदलाव

पहले की पुरानी व्यवस्था में पंचायती राज एक्ट 1994 की धारा 122 के तहत परिवार की एक अलग परिभाषा थी। उसमें सिर्फ दादा-दादी, माता-पिता, पति-पत्नी, बेटा-बेटी और अविवाहित बेटी का ही उल्लेख किया गया था। उस पुराने कानून में घर की बहू का कोई जिक्र बिल्कुल नहीं था। इस तकनीकी खामी के कारण बहू चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह योग्य मानी जाती थी। अब सरकार ने इस बड़ी खामी को दूर करते हुए नया कानून लागू किया है।

साल 2020 में भी उठी थी बदलाव की मांग

राज्य चुनाव आयोग ने साल 2020 के पंचायत चुनाव में भी राज्य सरकार से इस नियम को बदलने की जोरदार मांग की थी। आयोग चाहता था कि परिवार की परिभाषा में बदलाव हो और अतिक्रमण करने वाले परिवार की बहू भी चुनाव न लड़ सके। उस समय खतरनाक कोरोना महामारी फैली हुई थी और प्रशासन के पास समय की भारी कमी थी। इन्हीं सब कारणों के चलते उस वक्त इस अहम बदलाव को लागू करना संभव नहीं हो सका था।

प्रदेश में लाखों लोगों ने किया है अवैध कब्जा

हिमाचल प्रदेश में अवैध कब्जों के बड़े मामलों में लगभग एक लाख साठ हजार लोग और उनके परिवार सीधे तौर पर शामिल हैं। चुनाव आयोग के सख्त नियमों के अनुसार ये सभी लोग पहले से ही पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अपात्र माने जाते हैं। साल 2003 में अवैध कब्जों को नियमित करवाने के लिए इन परिवारों ने सरकार को स्वघोषणा पत्र दिए थे। उस दौरान सरकार के पास अपने दस्तावेज जमा करवाने पर इनकी बाकायदा मिसल काटी गई थी।

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