सुप्रीम कोर्ट से अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा को बड़ी राहत, बृंदा करात की याचिका खारिज, हेट स्पीच पर दिया बड़ा फैसला

New Delhi News: देश की सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और सांसद प्रवेश वर्मा को बड़ी राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने माकपा नेता बृंदा करात की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें दोनों नेताओं पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि संबंधित भाषणों की सामग्री में ऐसा कोई संज्ञेय अपराध नहीं पाया गया है, जिसके आधार पर आपराधिक मामला दर्ज किया जाए।

भाषणों में हिंसा भड़काने का कोई इरादा नहीं

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई के बाद दिल्ली हाई कोर्ट के पुराने फैसले को बरकरार रखा। पीठ ने रिकॉर्ड और विवादित बयानों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद अपनी टिप्पणी दी। कोर्ट ने माना कि ये भाषण किसी विशेष समुदाय को सीधे तौर पर निशाना नहीं बना रहे थे। इसके अलावा, कोर्ट को इन बयानों में हिंसा फैलाने या सार्वजनिक अव्यवस्था पैदा करने का कोई स्पष्ट इरादा नजर नहीं आया।

मजिस्ट्रेट के अधिकारों पर कोर्ट की अहम टिप्पणी

सर्वोच्च अदालत ने एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू स्पष्ट किया। हालांकि कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट की इस बात से असहमति जताई कि एफआईआर के आदेश से पहले सरकारी मंजूरी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 156(3) CrPC के तहत जांच शुरू करने के शुरुआती स्तर पर किसी भी पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती है। यह कानूनी स्पष्टीकरण भविष्य में इस तरह के अन्य मामलों के लिए एक नजीर साबित हो सकता है।

याचिका में था विवादित नारों का जिक्र

बृंदा करात ने अपनी याचिका में जनवरी 2020 की एक चुनावी रैली का हवाला दिया था। इसमें अनुराग ठाकुर द्वारा लगाए गए कथित नारे “देश के गद्दारों को, गोली मारो…” का विशेष उल्लेख किया गया था। याचिका में प्रवेश वर्मा के उन बयानों और मीडिया इंटरव्यू को भी आधार बनाया गया था, जो शाहीन बाग विरोध प्रदर्शन के दौरान दिए गए थे। याचिकाकर्ता का आरोप था कि इन बयानों ने दिल्ली में सांप्रदायिक तनाव और हिंसा को बढ़ाने का काम किया था।

हेट स्पीच पर विधायिका की जिम्मेदारी

हेट स्पीच जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी संवैधानिक सीमाओं को रेखांकित किया। अदालत ने साफ कहा कि हेट स्पीच से निपटने के लिए नया कानून बनाने का अधिकार विधायिका के पास है, न्यायपालिका के पास नहीं। कोर्ट ने माना कि ऐसे भाषण सामाजिक सद्भाव और संवैधानिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाते हैं। हालांकि, न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि अदालत अपनी मर्यादाओं से बाहर जाकर कानून बनाने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।

कानून और नीतियों पर सरकारों को सुझाव

अदालत ने मौजूदा कानूनी ढांचे पर संतोष जताते हुए कहा कि वर्तमान प्रावधानों में कोई बड़ी कमी नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने यह जरूर जोड़ा कि बदलते वक्त और चुनौतियों के अनुसार सरकारें नई नीतियां बनाने पर विचार कर सकती हैं। विधायिका चाहे तो हेट स्पीच की परिभाषा और सजा को लेकर नए प्रावधान जोड़ सकती है। इस फैसले के आने के बाद अब अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग करने वाली याचिका पूरी तरह खत्म हो गई है।

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