Bihar News: बिहार की ग्रामीण महिलाओं ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक नई क्रांति का सूत्रपात किया है। समाज को जागरूक करने वाली जीविका दीदियां अब ‘हरित जीविका, हरित बिहार’ अभियान के जरिए राज्य की सूरत बदल रही हैं। पिछले छह वर्षों के दौरान इन कर्मठ दीदियों ने राज्यभर में चार करोड़ से अधिक पौधरोपण कर एक मिसाल कायम की है। यह पहल न केवल प्रकृति को बचाने का काम कर रही है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती दे रही है।
नर्सरी विकास से बनी आर्थिक मजबूती
ग्रामीण विकास विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2019 से 2024-25 के बीच राज्य में जीविका दीदियों द्वारा 987 नर्सरी विकसित की जा चुकी हैं। इनमें 677 विशेष ‘दीदी की पौधशाला’ शामिल हैं। यह मॉडल कम लागत में अधिक उत्पादन सुनिश्चित करता है। नर्सरी संचालन से जुड़ी महिलाओं के लिए अब यह आय का एक स्थिर और सतत स्रोत बन गया है। पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ इन महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण भी तेजी से हो रहा है।
सामुदायिक उद्यम का सफल मॉडल
जीविका दीदियों द्वारा संचालित ये नर्सरियां अब एक सफल सामुदायिक उद्यम के रूप में पहचानी जा रही हैं। इनके माध्यम से ग्रामीण विकास की एक नई राह तैयार हुई है। नर्सरी के लिए दीदियों का चयन संकुल स्तरीय संघ के माध्यम से पूरी पारदर्शिता के साथ किया जाता है। चयन प्रक्रिया में उन दीदियों को प्राथमिकता दी जाती है जो स्वयं सहायता समूह की सक्रिय सदस्य हैं और जिनका वित्तीय रिकॉर्ड और ऋण वापसी का इतिहास बेहतरीन रहा है।
विशेषज्ञों से मिलता है तकनीकी प्रशिक्षण
पौधों की बेहतर देखभाल और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए इन दीदियों को विशेष तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा उन्हें इमारती लकड़ियों के पौधों के लिए तैयार किया जाता है। इसके अलावा, कृषि विभाग के तहत सेंटर फॉर एक्सीलेंस, देसारी (वैशाली) में फलदार वृक्षों के संरक्षण के लिए 15 दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस प्रशिक्षण से दीदियां वैज्ञानिक तरीके से पौधरोपण करना सीख रही हैं।
ग्रीन बिहार मिशन को मिली नई ऊंचाई
मुख्यमंत्री की प्राथमिकताओं में शामिल ‘जल-जीवन-हरियाली’ अभियान को जीविका दीदियों के इस प्रयास से जबरदस्त समर्थन मिला है। नर्सरी में तैयार पौधों का उपयोग सरकारी वनीकरण योजनाओं और सामुदायिक भूमि पर किया जा रहा है। बिहार के हर जिले में फैली ये नर्सरियां अब राज्य के ‘ग्रीन कवर’ को बढ़ाने में रीढ़ की हड्डी साबित हो रही हैं। महिलाओं के इस सामूहिक प्रयास ने साबित कर दिया है कि संकल्प और सही प्रशिक्षण से बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं।


