Business News: देश के सीमेंट सेक्टर पर अगले कुछ महीनों तक मंदी और मुनाफे के दबाव का काला साया मंडरा रहा है। सिस्टमैटिक्स इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इनपुट लागत में बढ़ोतरी और मांग में भारी कमी कंपनियों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है। हालांकि अप्रैल और मई में कंपनियों ने कीमतें बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन अलग-अलग राज्यों में गिरती मांग के कारण इन बढ़ी हुई कीमतों का टिक पाना फिलहाल मुश्किल नजर आ रहा है।
बढ़ती लागत और गिरता मुनाफा: सीमेंट सेक्टर के लिए खतरे की घंटी
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि ईंधन, पैकेजिंग और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण अगले एक-दो तिमाहियों तक कंपनियों का मुनाफा दबाव में रहेगा। विश्लेषकों ने इस सेक्टर की निकट-अवधि की मांग को लेकर काफी सतर्क रुख अपनाया है। मई महीने में पूरे भारत में सीमेंट की औसत कीमतें पिछले महीने के मुकाबले 10-13 रुपये प्रति बैग तक बढ़ गईं। इन बढ़ी हुई कीमतों का मुख्य कारण उत्पादन लागत में हुई बेतहाशा बढ़ोतरी है।
दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा लगी आग, उत्तर में दिखा मिला-जुला असर
कीमतों में बढ़ोतरी के मामले में दक्षिण भारत सबसे आगे रहा। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे बाजारों में सीमेंट की कीमतें 20-25 रुपये प्रति बैग तक उछल गईं। औसतन इस क्षेत्र में कीमतें 325 रुपये से बढ़कर 345 रुपये प्रति बैग के स्तर पर पहुंच गईं। वहीं उत्तरी क्षेत्र में राजस्थान की मजबूत मांग के कारण कीमतें 10 रुपये बढ़ीं, लेकिन दिल्ली और पंजाब में यह बढ़ोतरी महज 5 रुपये तक सीमित रही। बाजार में यह असंतुलन चिंता का विषय है।
मजदूरों की कमी और चुनाव: क्यों कम हो गई सीमेंट की मांग?
रिपोर्ट के अनुसार, सीमेंट की मांग में व्यापक मंदी के पीछे कई सामाजिक और राजनीतिक कारण जिम्मेदार हैं। शादी-ब्याह के सीजन के कारण मजदूरों की भारी कमी हो गई है। इसके अलावा राज्यों के चुनाव और खेती के कामों के लिए मजदूरों का वापस गांव लौटना भी बिक्री में गिरावट की बड़ी वजह बना है। पिछले तिमाही में बिक्री में जो तेजी देखी गई थी, वह अब पूरी तरह से खत्म होती नजर आ रही है।
गुजरात में वापस ली गई बढ़ोतरी, मुंबई में स्थिति स्थिर
मध्य भारत में सीमेंट की कीमतें लगभग स्थिर रहीं और यहां औसत दाम 360 रुपये प्रति बैग के आसपास दर्ज किए गए। पश्चिमी भारत में रुझान काफी अलग रहा। मुंबई में कीमतों में 8 रुपये की मामूली बढ़ोतरी हुई, लेकिन गुजरात की स्थिति इसके विपरीत रही। वहां मांग में आई भारी कमी के कारण कंपनियों को अपनी 10 रुपये की प्रस्तावित बढ़ोतरी वापस लेनी पड़ी। यह दर्शाता है कि कंपनियां अब बाजार की मांग के आगे बेबस हैं।
FY27 पर भी पड़ सकता है असर, मार्जिन बचाना हुआ मुश्किल
विशेषज्ञों का कहना है कि अब कंपनियों के पास मार्जिन बचाने के लिए कीमतें बढ़ाने के अलावा कोई और जरिया नहीं बचा है। हालांकि, वे कीमतें तभी बढ़ा पाएंगे जब मांग में सुधार होगा। निर्माण की लागत लगातार ऊंचे स्तर पर रहने से वित्त वर्ष 2027 (FY27) में भी मांग पर बुरा असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। अगर कच्चे माल के दाम कम नहीं हुए, तो आम आदमी के लिए घर बनाना आने वाले समय में और भी खर्चीला हो जाएगा।

