New Delhi News: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की स्नातक (Graduation) डिग्री से जुड़े विवाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) को अपनी आपत्ति दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है। यह मामला प्रधानमंत्री की डिग्री से संबंधित विवरणों को सार्वजनिक करने के लिए दायर अपीलों से जुड़ा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विश्वविद्यालय की आपत्ति के बाद अपीलकर्ता अपना पक्ष रखेंगे।
सॉलिसिटर जनरल बोले- मामले को सनसनीखेज बनाने की कोशिश
सुनवाई के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तीखी दलीलें पेश कीं। उन्होंने अदालत से कहा कि इस पूरे मामले में कोई ठोस आधार नहीं है और इसे केवल राजनीतिक रूप से सनसनीखेज बनाने का प्रयास किया जा रहा है। दूसरी ओर, अपीलकर्ताओं के वकील ने विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने दलील दी कि कोर्ट द्वारा पर्याप्त समय दिए जाने के ढाई महीने बाद भी डीयू ने अब तक देरी पर अपनी आधिकारिक आपत्ति दर्ज नहीं की है।
एकल पीठ के फैसले के खिलाफ है यह अपील
यह कानूनी लड़ाई केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के उस आदेश के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिसमें पीएम मोदी की डिग्री का रिकॉर्ड सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट की एकल पीठ ने पहले ही सीआईसी के इस आदेश को रद्द कर दिया था। अगस्त 2025 में दिए गए अपने फैसले में अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि कोई व्यक्ति केवल सार्वजनिक पद पर बैठा है, इसका मतलब यह नहीं कि उसकी सभी निजी जानकारियां सार्वजनिक की जा सकती हैं। इसी आदेश को अब खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी गई है।
20 अगस्त को तय होगी मामले की दिशा
दिल्ली हाई कोर्ट ने अब इस बहुचर्चित मामले की अगली सुनवाई के लिए 20 अगस्त की तारीख तय की है। अदालत ने अपीलकर्ताओं द्वारा देरी के लिए मांगी गई माफी को ध्यान में रखते हुए प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। अब सबकी निगाहें 20 अगस्त पर टिकी हैं, जब विश्वविद्यालय अपनी औपचारिक आपत्ति दर्ज कराएगा। यह मामला सूचना के अधिकार (RTI) और व्यक्तिगत निजता के बीच के कानूनी संतुलन को लेकर देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है।
