Patna News: पटना के मसौढ़ी उपमंडल में पारंपरिक जलस्रोतों पर बढ़ते अवैध अतिक्रमण और आधुनिक जीवनशैली ने पेयजल के संकट को गंभीर बना दिया है। कभी प्यास बुझाने वाले आहर, पोखर और पइन अब खुद अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। घटते जलस्तर और प्रदूषण के कारण लोगों का भरोसा कुओं और चापाकल से उठ गया है। अब लोग मजबूरी और सुविधा के लिए ‘समरसेबल’ और ‘डिब्बाबंद पानी’ (RO Water) पर निर्भर हो गए हैं। शादी-ब्याह से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक, डिब्बाबंद पानी का चलन तेजी से बढ़ गया है।
शुद्धता की कसौटी पर फेल होता सिस्टम
मसौढ़ी ब्लॉक और उसके आसपास के इलाकों में पानी की गुणवत्ता चिंताजनक बनी हुई है। जानकारों के अनुसार, पीने के लिए 75 से 150 टीडीएस (TDS) का पानी सबसे अच्छा माना जाता है। एक सर्वे के मुताबिक, मसौढ़ी ब्लॉक और गांधी मैदान के आसपास पानी का टीडीएस 350 से 400 तक पहुंच गया है। भारतीय मानक ब्यूरो के अनुसार 500 से कम टीडीएस सुरक्षित है, लेकिन बढ़ता प्रदूषण इसे असुरक्षित बना रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि मसौढ़ी में संचालित पानी सप्लाई एजेंसियों की गुणवत्ता की कभी प्रशासनिक स्तर पर जांच नहीं की गई।
मजबूरी में बदल गया डिब्बाबंद पानी का शौक
स्थानीय निवासियों का कहना है कि शहर के गंदे नालों का पानी जलस्रोतों में मिलने से बोरिंग का पानी भी दूषित हो गया है। वीर कुंवर सिंह कॉलोनी के लोग बताते हैं कि कई बार बोरिंग कराने के बाद भी पानी में झाग निकलता है, जिससे डिब्बाबंद पानी पीना अब मजबूरी बन गई है। वहीं, कुछ लोग नल-जल योजना के फटे पाइपों से आने वाले बैक्टीरिया युक्त पानी के डर से भी आरओ के डिब्बों पर भरोसा कर रहे हैं। सुविधा के इस दौर में लोग ₹20-30 खर्च कर घर बैठे पानी मंगाना ज्यादा सुरक्षित समझ रहे हैं।
बाजार में बढ़ी मांग, गुणवत्ता पर सवाल
दुकानदारों और आम नागरिकों के बीच अब डिब्बाबंद पानी की मांग इतनी बढ़ गई है कि मसौढ़ी में इसकी कई एजेंसियां सक्रिय हैं। अस्पताल रोड और लखीबाग जैसे इलाकों में लोग पानी की किल्लत और अशुद्धता के कारण इसी पर निर्भर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण के बिना केवल मशीनी फिल्टर पर निर्भरता लंबे समय में स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए घातक हो सकती है। फिलहाल, प्रशासन की ओर से इन एजेंसियों की जांच न होना जनता की सेहत के साथ बड़े खिलवाड़ जैसा है।
