Tamil Nadu News: तमिलनाडु की राजनीति में ऐतिहासिक और बड़ा बदलाव आया है। थलापति विजय की पार्टी टीवीके ने साल 2026 के चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया है। पार्टी ने एक सौ आठ सीटें जीतकर पुरानी द्रविड़ पार्टियों का वर्चस्व तोड़ दिया है। इस उथल-पुथल के बीच राज्य में नई सांस्कृतिक चर्चा शुरू हो गई है। लोग द्रविड़ समुदाय के प्रमुख देवता भगवान मुरुगन और प्राचीन तमिल धार्मिक परंपराओं की बात कर रहे हैं। मुरुगन पूजा का इतिहास काफी पुराना है।
कौन हैं भगवान मुरुगन और क्या है उनका महत्व?
हिंदू धर्म में भगवान मुरुगन को अत्यंत शक्तिशाली और प्रमुख देवता माना जाता है। शिव और माता पार्वती के पुत्र मुरुगन को युद्ध का देवता कहा जाता है। वह ज्ञान के प्रतीक हैं और बुराई का नाश करते हैं। मुरुगन के कई अन्य प्रसिद्ध नाम भी हैं। भक्त उन्हें कार्तिकेय, स्कंद, सुब्रमण्य, वेलन और अरुमुगन के नाम से पूजते हैं। दक्षिण भारत के लोग मुरुगन को अपना सर्वोच्च रक्षक मानते हैं। वह तमिल समाज की आस्था का मुख्य केंद्र हैं।
संगम काल से जुड़ा है मुरुगन पूजा का प्राचीन इतिहास
मुरुगन देवता की पूजा का इतिहास हजारों साल पुराना और रोचक है। प्राचीन संगम साहित्य में उनका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। यह साहित्य दो हजार साल से भी अधिक पुराना है। संगम काल के दौरान लोग मुरुगन को पहाड़ी इलाकों का देवता मानते थे। उन्हें प्रकृति, प्रेम और वीरता का प्रतीक माना जाता था। इतिहासकार बताते हैं कि द्रविड़ सभ्यता के शुरुआती समय से ही मुरुगन की पूजा होती आ रही है। यह परंपरा आज भी अटूट और जीवंत है।
भगवान शिव की तीसरी आंख से हुआ मुरुगन का जन्म
भगवान मुरुगन के जन्म की पौराणिक कथा बहुत ही अद्भुत और प्रेरणादायक है। मान्यताओं के अनुसार शिव जी की तीसरी आंख से तेज अग्नि की चिंगारियां निकली थीं। अग्नि देव और पवित्र गंगा नदी ने इन चिंगारियों को संभाला था। इसके बाद छह कृतिकाओं ने बालक का पालन-पोषण किया। बाद में माता पार्वती ने अपने प्रेम से इन छह रूपों को मिला दिया। इस तरह छह मुख वाले भगवान मुरुगन का जन्म हुआ और उन्होंने राक्षसों का वध किया।
तमिल संस्कृति में मुरुगन के छह पवित्र मंदिरों का स्थान
मुरुगन को विशेष रूप से तमिल देवता कहा जाता है। उनका तमिल भाषा, संस्कृति और प्राचीन परंपराओं से बहुत गहरा नाता है। तमिलनाडु में मुरुगन के छह बहुत प्रसिद्ध मंदिर मौजूद हैं। इन पवित्र स्थानों को अरुपदई वीडू के नाम से जाना जाता है। इनमें पलानी, तिरुचेंदूर, स्वामीमलाई, तिरुथानी, तिरुपरनकुंड्रम और पझामुदिरचोलाई मंदिर शामिल हैं। ये स्थल भगवान मुरुगन के जीवन की विभिन्न महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े हैं। यहां हर दिन भारी संख्या में श्रद्धालु उनके दर्शन करने आते हैं।
दुनिया भर में फैली है मुरुगन पूजा की गौरवशाली परंपरा
मुरुगन की पूजा करना तमिल लोगों के जीवन और परंपरा का अहम हिस्सा है। मुरुगन साहस, ज्ञान और महान जीत के प्रतीक हैं। वे लोगों को हमेशा आगे बढ़ने की सच्ची प्रेरणा देते हैं। थाईपुसम जैसे विशाल त्योहारों में लाखों लोग पूरे उत्साह के साथ भाग लेते हैं। तमिल समुदाय के लोग दुनिया में जहां भी बसे, वहां यह पवित्र परंपरा पहुंच गई। आज मलेशिया, सिंगापुर और श्रीलंका जैसे देशों में मुरुगन की भव्य पूजा बहुत धूमधाम से होती है।

