नेताजी के लिए राष्ट्रीय दिवस की मांग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पीठ बोली- ‘लोकप्रियता के लिए याचिका दाखिल करना बंद करें वरना एंट्री पर लगेगी रोक’

Delhi News: सुप्रीम कोर्ट ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती और आजाद हिंद फौज के स्थापना दिवस को राष्ट्रीय दिवस घोषित करने की मांग वाली जनहित याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने इस याचिका को एक प्रचार का हथकंडा बताते हुए याचिकाकर्ता वकील को कड़ी चेतावनी दी है। अदालत ने साफ कहा कि ऐसे नीतिगत फैसले लेना कार्यपालिका का काम है और न्यायपालिका इस दायरे में दखल नहीं दे सकती।

याचिका में यह भी आग्रह किया गया था कि नेताजी को सरकारी रूप से ‘राष्ट्र पुत्र’ की उपाधि से विभूषित किया जाए। इसके साथ ही ओडिशा के कटक में स्थित उनके जन्मस्थान को एक राष्ट्रीय संग्रहालय का दर्जा देने की भी मांग की गई थी। लेकिन भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इन सभी मांगों पर विचार करने से सिरे से इनकार कर दिया। पीठ ने याचिकाकर्ता के आचरण पर कड़ी आपत्ति जताई।

सुप्रीम कोर्ट ने जताई गहरी नाराजगी

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ का रुख बेहद सख्त दिखा। पीठ ने याचिकाकर्ता वकील की इस दलील पर गौर किया कि वह पिछली बार भी इसी तरह की जनहित याचिका दाखिल कर चुके हैं। अदालत ने पाया कि पूर्व की वह याचिका पहले ही खारिज की जा चुकी है। इसके बावजूद दोबारा वही मांग लेकर अदालत का समय बर्बाद किया गया।

न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह पूरी कवायद न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग से कम नहीं है। पीठ ने मौखिक टिप्पणियों में कहा कि यह याचिका महज लोकप्रियता हासिल करने का एक जरिया प्रतीत होती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी दिवस को राष्ट्रीय दिवस घोषित करने या किसी को उपाधि देने का कार्य केंद्र सरकार के नीति निर्धारण के अधीन आता है। इस विषय में न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं है।

वकील को मिली कोर्ट की फटकार और चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दाखिल करने वाले अधिवक्ता को कड़ी फटकार लगाते हुए भविष्य के लिए चेतावनी भी जारी की। पीठ ने कहा कि यदि इसी तरह की निरर्थक और बार-बार दोहराई जाने वाली याचिकाएं अदालत में पेश की जाती हैं तो संबंधित वकील के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। कोर्ट ने यहां तक संकेत दिया कि ऐसा करने वाले अधिवक्ताओं की सुप्रीम कोर्ट परिसर में प्रवेश पर ही रोक लगाई जा सकती है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि पिछली बार भी जब इसी तरह की याचिका खारिज की गई थी तो यह स्पष्ट कर दिया गया था कि यह मामला न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है। उस दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देशित किया था कि यदि उन्हें ऐसी कोई मांग उठानी है तो वह उचित सरकारी प्राधिकरण के समक्ष अपनी बात रखें। लेकिन इस बार फिर से अदालत का दरवाजा खटखटाया गया।

कौन थे नेताजी सुभाष चंद्र बोस?

सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे महानायक हैं जिनकी वीरता और रणनीति के किस्से आज भी देशवासियों में जोश भर देते हैं। उन्हें प्यार से ‘नेताजी’ कहा जाता था। ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए उन्होंने सशस्त्र संघर्ष का मार्ग अपनाया। जहां एक ओर कांग्रेस अहिंसक आंदोलन कर रही थी, वहीं नेताजी का मानना था कि आजादी के लिए हथियार उठाना भी आवश्यक है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी ने विदेशी धरती पर आजाद हिंद फौज का गठन किया था। इस सेना का नेतृत्व करते हुए उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सीधे सैन्य मोर्चा खोल दिया। उनका उद्घोष “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” आजादी के दीवानों के लिए एक अमर मंत्र बन गया। उन्होंने जर्मनी और जापान जैसे देशों से भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्थन जुटाया।

आज भी रहस्य बनी है नेताजी की मृत्यु

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का संपूर्ण जीवन संघर्ष और बलिदान की मिसाल है। उनका जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक शहर में हुआ था। वह भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास करने के बाद भी देश सेवा के लिए निकल पड़े। वर्ष 1945 में एक विमान दुर्घटना के बाद उनकी मृत्यु की खबर आई लेकिन यह आज भी एक बड़ा रहस्य बना हुआ है।

इस रहस्य को सुलझाने के लिए देश में कई बार आयोगों का गठन किया जा चुका है। इसके बावजूद नेताजी के अंतिम समय को लेकर आम जनता और इतिहासकारों के मन में कई सवाल अनुत्तरित हैं। फिर भी देश की आजादी में उनके योगदान को कभी कम करके नहीं आंका जा सकता। वह भारतीय इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में अंकित एक ऐसा नाम हैं जिससे हर भारतीय प्रेरणा लेता है।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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