India News: देश की सर्वोच्च अदालत ने आयकर विभाग और करदाताओं के बीच चल रही एक लंबी कानूनी जंग में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने विभिन्न उच्च न्यायालयों के उन आदेशों को रद्द कर दिया है, जिन्होंने क्षेत्राधिकार निर्धारण अधिकारियों (JAO) द्वारा जारी पुनर्मूल्यांकन नोटिसों को खारिज कर दिया था। इस फैसले के बाद अब हजारों टैक्स मामलों पर संबंधित उच्च न्यायालयों में नए सिरे से सुनवाई शुरू होगी, जिससे कर प्रशासन में नई हलचल पैदा हो गई है।
जेएओ बनाम फेसलेस असेसमेंट का मुख्य विवाद
इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ में यह सवाल था कि क्या आयकर अधिनियम की धारा 148 और 148ए के तहत नोटिस जारी करने का अधिकार स्थानीय क्षेत्राधिकार अधिकारियों (JAO) के पास है। करदाताओं का तर्क था कि ये मामले केवल ‘फेसलेस असेसमेंट’ तंत्र के माध्यम से ही निपटाए जाने चाहिए। इससे पहले कई हाईकोर्ट्स ने करदाताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए जेएओ के नोटिसों को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताकर रद्द कर दिया था, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट कर दी है।
वित्त अधिनियम 2026 और विधायी संशोधनों का प्रभाव
सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि वित्त अधिनियम, 2026 द्वारा किए गए संशोधनों के बाद अब कानूनी स्थिति पूरी तरह बदल गई है। नए नियमों, विशेष रूप से धारा 147ए को एक अप्रैल, 2021 से पूर्वव्यापी (Retrospective) प्रभाव के साथ लागू किया गया है। यह संशोधन जेएओ की शक्तियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। इसी विधायी आधार को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के पुराने फैसलों को दरकिनार करने का निर्णय लिया है।
30 सितंबर तक मामलों के निस्तारण का लक्ष्य
अदालत ने करदाताओं को अपनी याचिकाओं में आवश्यक संशोधन करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। साथ ही, सभी उच्च न्यायालयों से अनुरोध किया गया है कि वे इन हजारों लंबित मामलों का निपटारा 30 सितंबर, 2026 तक प्राथमिकता के आधार पर करें। जब तक उच्च न्यायालयों में यह कार्यवाही लंबित रहेगी, तब तक विवादित नोटिसों के आधार पर चल रही पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया पर अंतरिम रोक जारी रहेगी, जिससे करदाताओं को फिलहाल थोड़ी राहत मिली है।
कर प्रशासन में स्पष्टता आने की उम्मीद
सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख से कर प्रशासन और प्रक्रियात्मक अधिकारों को लेकर जारी भ्रम समाप्त होने की उम्मीद है। हालांकि, अदालत ने कानून की संवैधानिक वैधता या इसके पूर्वव्यापी प्रभाव पर अपनी कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है और इसे उच्च न्यायालयों के विवेक पर छोड़ दिया है। अब हजारों करदाताओं का भविष्य उच्च न्यायालयों के आगामी निर्णयों पर टिका हुआ है, जो यह तय करेंगे कि आयकर विभाग की यह कार्रवाई कितनी तर्कसंगत है।
